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बरेली की ऐतिहासिक रामलीला का ऑक्सफोर्ड तक का सफर: 22 साल के शोध से डॉ. अनिल मिश्रा ने दुनिया में दिलाई पहचान

Published: Wed, 21 Oct 2026 12:36 PM (IST)

डॉ. अनिल मिश्रा ने 22 वर्षों के शोध से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की रामलीलाओं को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई है। उनके ...और पढ़ें

बरेली के चौधरी तालाब में रामलीला का मंचन करते कलाकार। सौजन्य समिति

बरेली के चौधरी तालाब में रामलीला का मंचन करते कलाकार। सौजन्य समिति 

HighLights

  1. पश्चिमी उप्र की रामलीलाओं पर किया विशेष अध्ययन, दिलाया अंतरराष्ट्रीय स्थान

जागरण संवाददाता, बरेली। चौधरी तालाब की रामलीला हो या सुभाष नगर की, इनके मंचन में सिर्फ रामकथा ही नहीं, बल्कि शहर की सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक इतिहास भी समाहित है। इसी विरासत को दुनिया के सामने लाने में जुटे हैं सुभाष नगर की तिलक कालोनी निवासी शिक्षाविद् डाॅ. अनिल मिश्रा पार्थ।

22 वर्षों से रामलीला पर शोध कर रहे डाॅ. मिश्रा ने रुहेलखंड सहित उत्तर प्रदेश की रामलीलाओं की परंपरा, रंगमंच और बदलते स्वरूप का अध्ययन किया। उनके शोध को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है और रामलीला पर केंद्रित तीन पुस्तकों में उनके कार्य को स्थान मिला है।

डाॅ. मिश्रा के अनुसार, भारत में धार्मिक और सामाजिक आंदोलनों के दौर में कई अव्यावसायिक रामलीलाओं की स्थापना हुई। वर्ष 1870 से 1890 के बीच जालौन के कोंच, प्रयागराज की पत्थरचट्टी, कानपुर की परेड, लखनऊ की ऐशबाग, दिल्ली में लाल किला के सामने होने वाली रामलीला, बरेली की चौधरी तालाब और पीलीभीत के बीसलपुर की रामलीलाओं ने आकार लिया।

इसके बाद आजादी से लगभग एक दशक पहले भी कई रामलीलाएं शुरू हुईं। शाहजहांपुर की ओसीएफ और बरेली के सुभाष नगर की रामलीला इसी परंपरा का हिस्सा हैं।

ऑक्सफोर्ड की पुस्तकों में शोध को मिली जगह

वर्ष 2006 से डाॅ. मिश्रा ने नार्थ कैरोलाइना यूनिवर्सिटी की प्रो. पामेला लेट्सफैक के साथ मिलकर रुहेलखंड की रामलीलाओं पर काम किया। इस शोध से जुड़े उनके योगदान को आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित तीन पुस्तकों में जगह मिली।

वर्ष 2010 की एपिक नेशन, वर्ष 2025 की राधेश्याम रामायण: टेक्स्ट एंड फार्मेशन और वर्ष 2026 की द थिएटर आफ रामलीला एंड द राधेश्याम रामायण में उनके शोध का उल्लेख है।

दूसरी पुस्तक में कलाकारी और निर्देशन पर उनके आठ पृष्ठ हैं, जबकि तीसरी पुस्तक के पहले पृष्ठ पर उनका चित्र प्रकाशित है। एक पुस्तक के कर पर उनका फोटो हनुमान जी के किरदार में प्रकाशित है।

तकनीक ने बदला मंचन, पुरानी रामलीलाओं पर संकट

डाॅ. मिश्रा बताते हैं कि आधुनिक तकनीक ने रामलीला के मंचन को नया स्वरूप दिया है। दिल्ली, मुरादाबाद, गाजियाबाद और प्रयागराज सहित कई स्थानों पर एलईडी स्क्रीन, ड्रोन, लेजर लाइट और डबिंग साउंड का इस्तेमाल हो रहा है।

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वहीं, बाराबंकी, प्रतापगढ़, कासगंज और बदायूं जैसे क्षेत्रों में पारंपरिक रामलीलाएं आर्थिक सहयोग की कमी और बदलते समय की चुनौतियों से जूझ रही हैं। डाॅ. मिश्रा को रामलीला पर शोध के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित भी किया जा चुका है।

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