रोशनी के पर्व पर सजीं मिट्टी के दीयों की दुकानें, बलिया में आधुनिकता के दौर में भी बरकरार है परंपरा
बलिया में दीपावली पर इलेक्ट्रॉनिक झालरों के बावजूद मिट्टी के दीयों का महत्व बरकरार है, जिनकी दुकानें सजने लगी हैं। ...और पढ़ें
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जागरण संवाददाता, बलिया। आधुनिकता के दौर में भले ही इलेक्ट्रानिक झालरों और रंग-बिरंगी लाइटों का चलन बढ़ गया है, लेकिन दीपावली पर मिट्टी के दीयों का महत्व आज भी बरकरार है। यही वजह है कि दीपावली से पहले नगर के बाजारों में मिट्टी के दीयों की दुकानें सजने लगी हैं। अब बदलते समय और ग्राहकों की पसंद को देखते हुए कुम्हार भी आकर्षक डिजाइन वाले दीये तैयार कर रहे हैं।
नगर के बाजारों में साधारण मिट्टी के दीये 40 से 60 रुपये सैकड़ा बिक रहे हैं, जबकि आकर्षक डिजाइन वाले दीयों की कीमत 400 से 500 रुपये सैकड़ा तक है। कुम्हार ग्राहकों की पसंद के अनुसार अलग-अलग आकार और डिजाइन के दीये तैयार कर रहे हैं। जयप्रकाशनगर के दलजीत टोला निवासी आचार्य पंडित गोरखनाथ चतुर्वेदी ने बताया कि दीपावली में मिट्टी के दीये ही शुभ माने गए हैं। यही दीये भगवान को भी स्वीकार होते हैं। यह हमारी पुरानी परंपरा है।
दीपावली नजदीक आते ही दीयों की खरीदारी शुरू हो गई है। साधारण दीयों के साथ डिजाइनदार दीयों की भी मांग है। ग्रामीण क्षेत्रों से इसकी थोक में खरीदारी की जाती है। -कन्हैया प्रसाद। दुकानदार।
इलेक्ट्रानिक झालरों और रंगीन लाइटों के बावजूद पूजा के लिए मिट्टी के दीयों की मांग बनी हुई है। कई ग्राहक घर की सजावट के लिए डिजाइनदार दीये पसंद करते रहे हैं।-विशाल प्रजापति, दुकानदार।
10 परिवारों की चलती है आजीविका
दीपावली पर मिट्टी के दीये जलाना धार्मिक परंपरा के साथ ग्रामीण कारीगरों की आजीविका से भी जुड़ा है। ननहुल गांव निवासी सच्चिदानंद प्रजापति ने बताया कि मिट्टी के दीये बनाने का काम उनके परिवार की पुश्तैनी परंपरा है। चाक के सहारे करीब 10 परिवारों की आजीविका चलती है। परिवार के सदस्य मिट्टी तैयार करने, दीये बनाने, सुखाने, पकाने और बाजार में बेचने तक का काम मिलकर करते हैं। दीपावली में मिट्टी के दीये की बिक्री को लेकर पहले से तैयारी चल रही है।