40 साल सेना में रहे मेजर, अब मंच पर गूंजता है रावण का अट्टहास; पढ़ें 179 साल पुरानी रामलीला की अनोखी कहानी
पूर्व सूबेदार मेजर ज्ञानेश शंखधार बिसौली की 179 वर्ष पुरानी रामलीला में अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाते हुए ...और पढ़ें

बिसौली की प्राचीन रामलीला में मंचन करते ज्ञानेश शंखधार। स्रोत - स्वयं
HighLights
हत्सा के कलाकारों ने चार दशकों तक रामलीला में जीवित रखी अभिनय की परंपरा
सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद अस्पताल प्रबंधक ज्ञानेश निभा रहे रावण का किरदार
प्रमोद मिश्रा, बिसौली (बदायूं)। मंच पर जब कड़कती आवाज गूंजती है और रौबदार मूंछों वाले रावण का प्रवेश होता है, तो दर्शक दीर्घा में सन्नाटा छा जाता है। यह कोई साधारण अभिनय नहीं, बल्कि नगर की 179 वर्ष पुरानी श्री प्राचीन रामलीला का वह जीवंत दृश्य है, जिसमें इतिहास और परिवार की भावनाएं एक साथ सांस लेती हैं।
नाट्य परिषद हत्सा द्वारा आयोजित इस रामलीला की विशेषता यह है कि इसके सारे कलाकार इसी गांव से आते हैं और पीढ़ियों से अपनी इस सांस्कृतिक विरासत को सहेजते आ रहे हैं।
नगर की 179 वर्ष पुरानी श्री प्राचीन रामलीला में हत्सा गांव के कलाकारों की पीढ़ियों से चली आ रही अभिनय परंपरा आज भी अपनी पूरी भव्यता के साथ जीवंत है, जहां पूर्व सूबेदार मेजर ज्ञानेश शंखधार अपने पिता स्वर्गीय रामनारायण शर्मा की विरासत को संभालते हुए रामलीला में रावण का किरदार निभा रहे हैं।

इस परंपरा की नींव में ज्ञानेश शंखधार के पिता का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। उन्होंने लगातार 40 वर्षों तक इसी मंच पर रावण का किरदार इस शिद्दत से निभाया कि लोग उन्हें उनके वास्तविक नाम से कम और रावण के रूप में अधिक जानने लगे।
वर्ष 2012 में जब उनका निधन हुआ, तो बिसौली का वह रावण हमेशा के लिए राम के धाम चला गया। लेकिन उस पात्र का प्रताप और पिता का आशीर्वाद थामने के लिए उनके पुत्र ज्ञानेश शंखधार आगे आए।
भारतीय सेना में सूबेदार मेजर के पद पर चार दशकों तक देश की सरहदों की रक्षा करने वाले ज्ञानेश ने 2014 में रिटायरमेंट के बाद सीधे रामलीला के मंच का रुख किया।

वर्तमान में बरेली के एक अस्पताल में प्रबंधक की जिम्मेदारी संभाल रहे ज्ञानेश का जीवन एक अनोखा संतुलन है। वे दिनभर अस्पताल में रहकर अपना काम करते हैं और रात होते ही रावण के अहंकार, तेज और प्रताप को मंच पर उतार देते हैं।
जब वे मंच पर कदम रखते हैं, तो उन्हें अपने दिवंगत पिता की दैवीय ऊर्जा और आशीर्वाद का अहसास होता है। उनका यह अटूट संकल्प है कि वे अपने अंतिम समय तक कला की इस पवित्र वेदी से जुड़े रहेंगे।
हत्सा गांव की यह गाथा केवल एक रामलीला भर नहीं है, बल्कि यह पिता पुत्र के समर्पण और अभिनय के प्रति उस अटूट निष्ठा की कहानी है जो समय की सीमा को पार कर अमर हो चुकी है।
रावण के रोल ने दी शांति
ज्ञानेश शंखधर ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि रावण का किरदार निभाने के बाद से उन्हें व्यक्तिगत जीवन में अद्भुत मानसिक शांति का अनुभव होता है।
भगवान श्री राम की कृपा से वह हर साल श्रावण मास में रामचरितमानस का पाठ करते हैं। यह भूमिका उनके जीवन का एक गहरा और आध्यात्मिक हिस्सा बन चुकी है, जो उन्हें निरंतर सकारात्मक ऊर्जा और भक्ति प्रदान करती है।
अंतिम सांस तक मंचन करने की चाहत
मंच पर आते ही ज्ञानेश को महसूस होता है कि उनके भीतर उनके पिता का रूप उतर आया है। उस समय शरीर में एक अजब स्फूर्ति और आवाज में भारी बुलंदी आ जाती है। उनकी अब केवल यही एकमात्र इच्छा है कि वह जीवन की अंतिम सांस तक रामलीला का मंचन करते रहें और अपनी कला से लोगों को जोड़े रखें।
