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अयोध्या की महिलाओं ने खर-पतवार से बनाई अपनी पहचान, बनीं आत्मनिर्भर उद्यमी

Published: Wed, 04 Nov 2026 11:08 AM (IST)

अयोध्या के मीरमऊ घाट गांव की महिलाएं सरपत और मूंज जैसे खर-पतवार से हस्तशिल्प उत्पाद बनाकर आत्मनिर्भर बन रही हैं। ...और पढ़ें

यह तस्वीर AI द्वारा बनाई गई है।

यह तस्वीर AI द्वारा बनाई गई है।

HighLights

  1. मीरमऊ घाट की महिलाएं मूंज-सरपत से हस्तशिल्प बनाती हैं।

  2. यह हुनर उन्हें सम्मानजनक रोजगार और आत्मनिर्भरता देता है।

  3. पारंपरिक कला से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिल रही है।

राकेश श्रीवास्तव, बाबाबाजार (अयोध्या)। खेतों की पगडंडियों पर उगने वाले सरपत और मूंज को लोग खर पतवार समझते हैं लेकिन वही खर-पतवार अब गांव की महिलाओं की अंगुलियों से गुजर कर खूबसूरत उत्पादों में ढल रहा है। आधुनिकता की दौड़ में जहां पारंपरिक हस्तशिल्प धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर है, वहीं बाबाबाजार क्षेत्र स्थित गोमती नदी तट पर बसे मीरमऊ घाट गांव की महिलाएं आज भी अपनी पुरखों की विरासत को सहेजे हुए हैं।

यहां महिलाएं केवल बांस, मूंज और सरपत जैसे खर पतवार से निर्मित चारपाई बीनने वाली बाध ही नही बुनती हैं, बल्कि डलिया, चटाई सहित अन्य पारंपरिक घरेलू रोजमर्रा की उपयोग वाली वस्तुएं भी बनाती हैं और उसके विपणन की जिम्मेदारी भी स्वयं निभाती हैं। यही कारण है कि उनका यह हुनर आज उनके लिए सम्मानजनक रोजगार और आत्मनिर्भरता का माध्यम बन चुका है।

गांव की महिलाएं भले ही उच्च शिक्षा से वंचित हों, लेकिन उद्यमिता की मिसाल बनकर परिवार की आर्थिक रीढ़ साबित हो रही हैं। यहां लगभग हर घर में महिलाएं बाध बुनने का कार्य करती हैं। पुरुष जहां खेती-किसानी और मजदूरी कर परिवार का सहारा बनते हैं, वहीं महिलाएं इस पारंपरिक हुनर के माध्यम से आय अर्जित कर घर-परिवार की जरूरतों को पूरा कर रही हैं।

गांव की मतना देवी बताती हैं कि बाध बुनने के लिए जंगल से मूंज, घास व सरपत तोड़कर लाना पड़ता है। उसको सुखाने के बाद साइकिल के रिम से बनाई गई गरारी की सहायता से मूंज को मोड़ा और गूंथा जाता है। इसके बाद कुशल हाथों से बाध तैयार की जाती है। इस व्यवसाय से प्रतिमाह 10 से 15 हजार रुपये की आय हो जाती है। बाबा बाजार, नेवरा, शुजागंज, भक्तनगर सैदपुर सहित आसपास के जिलों की बाजारों में भी यहां की बाध की बड़े पैमाने पर बिक्री होती है। यहां निर्मित बाध अपनी मजबूती, सुंदरता और उपयोगिता के कारण लोगों की पसंद बनी हुई है।

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खर पतवार बना आजीविका का आधार
उद्दम से जुड़ी गांव की निर्मला, मंजू, अनीता व कामिनी ने बताया कि हस्त कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। इसी रोजगार से बच्चों की शिक्षा, शादी-विवाह और घरेलू खर्चों का प्रबंध किया जाता है। सरकारी योजनाओं और महिला सशक्तिकरण की चर्चाओं के बीच मीरमऊ घाट गांव की महिलाएं बिना किसी संसाधन के अपने हुनर के बल पर आत्मनिर्भर बन जीवन संवार रही हैं। उनका यह प्रयास साबित करता है कि यदि परंपरा को रोजगार से जोड़ा जाय तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिल सकती है।

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