एतिहासिक रायपुर मेला: 100 बीघा में सजती हैं दुकानें, 35 लाख मेलार्थियों से रामनगरी में होता है करोड़ों का कारोबार
अयोध्या का ऐतिहासिक रायपुर मेला 125 वर्षों से अपनी काष्ठ कला और सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है। यह मेला ...और पढ़ें
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एतिहासिक रायपुर मेला में 100 बीघे में सजती है हजारों दुकानें।
HighLights
रायपुर मेला 125 वर्षों से काष्ठ कला की विरासत सहेजे है।
यह मेला 100 बीघा क्षेत्र में 35 लाख लोग आकर्षित करता है।
मेले में लकड़ी के सामान और करोड़ों का कारोबार होता है।
प्रहलाद तिवारी, अयोध्या। जीते लकड़ी, मरते लकड़ी, देख तमाशा लकड़ी का... ये लोकप्रिय लाइनें आपने बहुत बार सुनीं और दोहराईं होंगी लेकिन इन्हें साकार रूप में देखना हो तो रायपुर मेला चले आइये। धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत का पर्याय बन चुका मेला अपनी काष्ठ कला के लिए विशिष्ट पहचान रखता है।
आज जब स्टील, प्लास्टिक, फाइबर और कांच के सामान ने घरों में जगह बना ली है, तब रायपुर मेला लकड़ी की कारीगरी और नक्काशी की अनूठी विरासत को सहेजे है। अयोध्या-लखनऊ हाईवे के निकट व शहर से सटे सोहावल तहसील के रायपुर गांव में लगने वाला मेला 125 वर्षों से परंपरा, आस्था और काष्ठ कला की नायाब विरासत है।
इन जिलों से पहुंचते हैं लोग
अनंत चतुर्दशी से शुरू होने वाला मेला करीब डेढ़ महीने तक गुलजार रहता है। यहां लकड़ी के घरेलू सामान और आधुनिक फर्नीचर की खरीदारी के लिए अयोध्या समेत बाराबंकी, सुलतानपुर, अमेठी, प्रतापगढ़, रायबरेली, हरदोई, अंबेडकरनगर और लखनऊ सहित कई जिलों से लोग पहुंचते हैं।
शाहजहांपुर के तिलहर व बिहार के कारीगर भी अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। मेले की पहचान लकड़ी से बनी वस्तुएं और उन पर की गई बारीक नक्काशी है। कभी ओखली, मथनी, चौका-बेलन, मुगरी, फरुही, खूंटी, खड़ाऊं, रेहल और अरघी जैसी रोजमर्रा की वस्तुएं यहां के प्रमुख आकर्षण हुआ करती थीं।
इन चीजों की होती है बिक्री
बदलते समय के साथ कई वस्तुएं चलन से बाहर हो गईं, लेकिन लकड़ी की चारपाई, मचिया, पीढ़ा, चौकी, तख्त और बेंच की मांग अब भी बनी हुई है। दरवाजे-पल्ले, खिड़कियां, बेड, सोफा सेट, श्रृंगारदान और आलमारी जैसे फर्नीचर भी बिक्री के लिए उपलब्ध हैं।
40 वर्ष से यहां पर दुकान लगा रहे बाराबंकी के जैदपुर के शहाबुद्दीन कहते हैं कि पापा के साथ यहां दुकान लगाने आते थे, अब उनका बेटा हाथ बंटाने आता है। 75 प्रतिशत सामान बिक जाता है। 36 वर्ष से मूर्ति व माला बेचने वाले बस्ती के गुड्डू बताते हैं कि प्रतिदिन एक हजार से अधिक की बिक्री होती है।
100 बीघा क्षेत्रफल में लगता है मेला
मेला प्रबंधन से जुड़े जिला सहकारी बैंक के सभापति धर्मेंद्र प्रताप सिंह टिल्लू ने बताया कि यहां पर दुकान लगाने के लिए एक माह पहले से दुकानदारों को जगह आवंटन किया जाता है। मेले में तीन करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार मेले की आर्थिक अहमियत को दर्शाता है। 100 बीघा क्षेत्रफल में फैले मेले में 35 लाख लोग आते हैं। मेले को अलग-अलग हिस्सों में सजाया जाता है।
लकड़ी का बाजार, कपड़ों की दुकानें, खेल-तमाशे और खानपान के लिए अलग-अलग क्षेत्र निर्धारित किए जाते हैं। सरोवर में स्नान और अनंत भगवान के मंदिर में दर्शन के बाद लोग खरीदारी और मनोरंजन का आनंद लेते हैं। लकड़ी के सामानों के अलावा कपड़े, सौंदर्य प्रसाधन, खिलौने, मिठाइयों और खानपान की दुकानें भी सजती हैं। कृषि कार्य में उपयोग होने वाले हर्ष, जुवाट, खुरपा, लोहे के उपकरण भी खूब बिकते हैं। मनोरंजन के लिए विभिन्न प्रकार के झूले भी आकर्षण बढ़ाते हैं।
अकाल से जुड़ी है मेले की शुरुआत
मेले में खरीददारी कर रहे श्री हनुमत निवास अयोध्या के पीठाधीश्वर आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण ने बताया कि वर्ष 1901 में अकाल पड़ने पर ग्रामीणों ने बाबा रामचरनदास से उपाय पूछा। उनके सुझाव पर ठाकुर बलदेव सिंह की अगुवाई में ग्रामीणों ने अनंत भगवान के मंदिर में सामूहिक रामधुन से प्रार्थना की।
इसके बाद अनंत चतुर्दशी के दिन बेमौसम बारिश हुई। तभी से इस तिथि पर मेला लगाने की परंपरा शुरू हुई। आचार्य बताते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के वोकल फार लोकल की अवधारणा को साकार करता रायपुर मेला किसी उत्सव से कम नहीं।
