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तालाबों से निकलकर मंडी तक, अमेठी में सिंघाड़े की खेती बन रही मुनाफे का सौदा; धान छोड़ किसान अपना रहे यह राह

Published: Sat, 31 Oct 2026 03:26 PM (IST)

जायस, अमेठी में किसान रात में तालाबों से सिंघाड़ा तोड़कर सुबह मंडी में बेचते हैं, जिससे उन्हें धान की तुलना ...और पढ़ें

यह तस्वीर एआई द्वारा बनाई गई है।

यह तस्वीर एआई द्वारा बनाई गई है।

HighLights

  1. रात में सिंघाड़ा तोड़कर सुबह मंडी में बिक्री।

  2. कम लागत, अच्छी कीमत से किसानों को लाभ।

  3. रोगों और तालाब की सफाई मुख्य चुनौतियां।

वहीद अब्बास नकवी (अमेठी)। शहर जब गहरी नींद में होता है, उस समय जायस के किसान तालाबों में उतरकर सिंघाड़ा तोड़ने में जुट जाते हैं। रात तीन बजे से शुरू होने वाली किसानों की यह मेहनत सुबह चार बजे मंडी पहुंचती है। इसके बाद सुबह साढ़े छह बजे तक लगने वाली मंडी में खरीद-फरोख्त का सिलसिला चलता है। जिले में सिंघाड़े के कारोबार का प्रमुख केंद्र बन चुकी इस मंडी में रोजाना किसानों और व्यापारियों की भीड़ जुटती है।

सिंघाड़े की खेती किसानों के लिए आमदनी का अच्छा जरिया बन रही है। जुलाई में तालाबों में इसकी रोपाई की जाती है और अक्टूबर के अंतिम सप्ताह तक फसल तैयार हो जाती है। किसानों के मुताबिक एक बीघे के तालाब में करीब 20 क्विंटल तक सिंघाड़े का उत्पादन होता है। कम लागत और अच्छी कीमत मिलने से किसानों का रुझान इस खेती की ओर बढ़ रहा है।

कई किसान धान की अपेक्षा सिंघाड़े की खेती को अधिक लाभकारी मान रहे हैं। शुक्रवार को जायस मंडी में उबला सिंघाड़ा 510 रुपये पसेरी और कच्चा सिंघाड़ा 120 रुपये पसेरी बिका। अच्छे भाव मिलने से किसानों को राहत मिली।

रोग से प्रभावित होती है फसल

सिंघाड़े की खेती में पत्तियों का सड़ना, फल का काला पड़ना और कीटों का प्रकोप किसानों के लिए परेशानी का कारण बनता है। किसानों के अनुसार तालाब के पानी की गुणवत्ता खराब होने से फसल पर प्रतिकूल असर पड़ता है। रोग लगने से उत्पादन प्रभावित होता है और आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। किसानों का कहना है कि तालाब की नियमित सफाई, खराब पत्तियों को हटाने और कृषि विशेषज्ञों की सलाह से उचित उपचार करने पर नुकसान से बचा जा सकता है।

मेहनत अधिक, लेकिन आमदनी से संतुष्ट किसान

किसान सोहन लाल बताते हैं कि एक बीघे में करीब 20 क्विंटल तक सिंघाड़ा पैदा हो जाता है। लागत कम होने से खेती में अच्छा मुनाफा मिलता है। विनोद ने बताया कि सिंघाड़ा की खेती में मेहनत अधिक है, लेकिन उपज की बिक्री हो जाती है। राजिंदर का कहना है कि पहले वह धान की खेती करते थे, लेकिन अब सिंघाड़े की खेती अधिक फायदेमंद लगती है।

प्रकाश व ठाकुरदीन के अनुसार तालाब का पानी साफ रखना जरूरी है, क्योंकि गंदे पानी से फल काला पड़ने लगता है। मंशा राम व राजे के मुताबिक खेती में पूरा परिवार सहयोग करता है। महेश व छिद्दू ने सरकार से तालाबों की सफाई और उन्हें पट्टे पर उपलब्ध कराने में किसानों को सहयोग देने की मांग की।

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