रील और सुर्खियों तक सीमित न रहें, गहराई से पढ़ें; सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस मसीह ने AMU छात्रों को दी सीख
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह ने एएमयू के छात्रों को मोबाइल पर रील्स और सुर्खियों तक सीमित ...और पढ़ें

HighLights
रील्स नहीं, गहराई से पढ़कर सोच विकसित करें युवा।
अस्वीकृति को कमजोरी नहीं, सफलता की सीढ़ी बनाएं।
अपनी भाषा, जड़ों और मूल्यों से जुड़े रहें हमेशा।
जागरण संवाददाता, अलीगढ़। मोबाइल फोन पर सूचनाओं की भरमार के बीच गहराई से पढ़ने और स्वतंत्र रूप से सोचने की आदत युवाओं के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। कुछ सेकंड की रील देखना या केवल खबरों की सुर्खियां पढ़ लेना किसी विषय को समझने के लिए पर्याप्त नहीं है। युवाओं को सूचना और वास्तविक ज्ञान के बीच का अंतर समझना होगा।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश और एएमयू के पूर्व छात्र जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह ने शनिवार को सर सैयद दिवस समारोह में विद्यार्थियों को यह संदेश दिया। उन्होंने कहा कि पढ़ने, सवाल पूछने और विचारों का विश्लेषण करने की आदत ही व्यक्ति को बेहतर निर्णय लेने में सक्षम बनाती है।
जस्टिस मसीह ने कहा कि आज की पीढ़ी के पास जानकारी हासिल करने के साधन पहले से कहीं अधिक हैं। मोबाइल फोन के जरिये दुनिया भर की जानकारियां तुरंत उपलब्ध हो जाती हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि अधिक जानकारी मिलने से समझ भी उतनी ही गहरी हो जाए। विद्यार्थियों को केवल सूचनाएं देखने के बजाय विषयों को विस्तार से पढ़ना, उनके पीछे के तर्क को समझना और सीखी गई बातों को व्यवहार में उतारना चाहिए।
अस्वीकृति को अपनी कमजोरी नहीं बनने दें
जस्टिस मसीह ने युवाओं को जीवन में मिलने वाली असफलताओं और अस्वीकृति से न घबराने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि परीक्षा में अपेक्षित परिणाम न मिलना या साक्षात्कार में चयन न होना जीवन की यात्रा का अंत नहीं है। ऐसी परिस्थितियां व्यक्ति को दो विकल्प देती हैं- वह निराश होकर रुक जाए या अपनी कमियों को पहचानकर आगे बढ़े। युवाओं को अस्वीकृति को अपनी कमजोरी बनाने के बजाय उससे सीख लेकर सफलता का रास्ता तैयार करना चाहिए।
पहचान और मूल्यों से समझौता न करें
उन्होंने कहा कि आज सोशल मीडिया के दौर में लोग दूसरों जैसा दिखने और उनकी नकल करने की कोशिश करते हैं। युवाओं को इसके बजाय अपनी भाषा, जड़ों और मूल्यों से जुड़े रहते हुए अपनी अलग पहचान बनानी चाहिए। साथ ही समाज में एकता और आपसी सम्मान को बनाए रखना भी जरूरी है। विविधता को कमजोरी नहीं, बल्कि समाज की ताकत के रूप में देखना चाहिए।
सपने देखने की कोई उम्र नहीं
जस्टिस मसीह ने अपने छात्र जीवन की यादें साझा करते हुए बताया कि वर्ष 1977 में वह अलीगढ़ आए थे। सेफुद्दीन ताहिर हाईस्कूल में पढ़ाई के बाद उन्होंने एएमयू से विज्ञान और कानून की शिक्षा हासिल की। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय की कक्षाओं, पुस्तकालय और हबीब हाल के छात्रावास में बिताए समय ने उनके व्यक्तित्व को आकार दिया। उन्होंने विद्यार्थियों को बड़े लक्ष्य निर्धारित करने और निरंतर मेहनत करने की सलाह दी।
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जस्टिस मसीह ने कहा कि किसी अच्छे काम की शुरुआत के लिए सही समय का इंतजार करने के बजाय पहला कदम उठाना जरूरी है। व्यक्ति को केवल अपनी सफलता तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि यह भी सोचना चाहिए कि उसके प्रयासों से आने वाली पीढ़ियों को क्या लाभ मिलेगा।
