आगरा, जागरण संवाददाता। दुनिया की सर्वाधिक प्राचीन भाषाओं में शुमार और देवभाषा कही जाने वाली संस्कृत देश में विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गई है। 121 करोड़ की आबादी में से केवल 24821 लोग ही संस्कृत बोलते हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर गृह मंत्रालय के महारजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त कार्यालय के भाषा विभाग ने जनसूचना अधिकार (आरटीआइ) में यह सूचना उपलब्ध कराई है।

आरटीआइ कार्यकर्ता ने मांगी थी सूचना

आगरा के आरटीआइ कार्यकर्ता डा. देवाशीष भट्टाचार्य ने छह सितंबर को यह सूचना आनलाइन आवेदन कर मांगी थी। महारजिस्ट्रार कार्यालय के शोध अधिकारी डा. नक्कीरर ने उन्हें सूचना उपलब्ध कराई है। उनके अनुसार वर्ष 2011 में देश में जनगणना हुई थी। तब देश में संस्कृत बोलने वालों की संख्या देश की आबादी (121 करोड़) के अनुपात में केवल 0.002 प्रतिशत थी।

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भारत सरकार ने नहीं दिया अल्पसंख्यक दर्जा

डा. भट्टाचार्य को कार्यालय ने अवगत कराया है कि संस्कृत को भारत सरकार ने अल्पसंख्यक दर्जा प्रदान नहीं किया है, यह अधिसूचित भाषाओं में शामिल है। हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला हुआ है। संस्कृत अनिवार्य भाषा नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए मातृभाषा व क्षेत्रीय भाषाओं को चुनने के विकल्प उपलब्ध हैं। कार्यालय ने संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा के सवाल के जवाब में कार्यालय में सूचना उपलब्ध नहीं होने की बात कही है। 

Edited By: Abhishek Saxena

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