Pitru Paksha 2026: जिस माता-पिता ने उंगली पकड़कर चलना सिखाया, उसी को बुढ़ापे में वृद्धाश्रम छोड़ गए बेटा
पितृपक्ष के पहले दिन आगरा के रामलाल वृद्धाश्रम में पांच बुजुर्गों को अपनों से मिले दर्द के बाद शरण मिली, ...और पढ़ें

Pitru Paksha 2026: पितृ पक्ष में आश्रम पहुंचे बुजुर्गग।
HighLights
पितृपक्ष के पहले दिन पांच बुजुर्गों को वृद्धाश्रम में शरण मिली।
एक बुजुर्ग दंपत्ति को उनके बच्चे सम्मानपूर्वक घर ले गए।
यह घटना जीवित माता-पिता के प्रति कर्तव्य पर सवाल उठाती है।
जागरण संवाददाता, आगरा। Agra News: पितृपक्ष के पहले दिन जब घरों में पितरों के नाम तर्पण हो रहा था, यमुना घाटों पर पूर्वजों का स्मरण किया जा रहा था और श्राद्ध की तैयारियां चल रही थीं, उसी दिन सिकंदरा स्थित रामलाल वृद्धाश्रम की चौखट पर पांच बुजुर्ग आ पहुंचे। किसी ने अपनों से मिले दर्द के बाद आश्रम में शरण ली तो किसी को बुढ़ापे में सहारे की जरूरत थी।
इसी बीच पितृपक्ष ने किरावली निवासी 80 वर्षीय रोशन लाल सिंह और उनकी पत्नी गुड्डी देवी के बच्चों को अपने जीवित माता-पिता की याद दिलाई और वह दोनों को सम्मानपूर्वक घर ले गए। एक ही दिन सामने आईं दोनों तस्वीरों ने पितृपक्ष के बीच रिश्तों की दो अलग-अलग सच्चाई बयां की। एक ओर पांच बुजुर्गों के लिए वृद्धाश्रम की चौखट सहारा बनी, दूसरी ओर पितृपक्ष की याद ने एक परिवार को अपने जीवित माता-पिता तक वापस पहुंचा दिया।
अपनों से दूर होकर आश्रम पहुंचे पांच बुजुर्ग
Agra News, Pitru Paksha 2026: सिकंदरा स्थित रामलाल वृद्धाश्रम में पहुंचने वालों में खेड़िया मोड़ निवासी 61 वर्षीय राजेश अग्रवाल, नयाबाग-सिविल लाइंस निवासी 68 वर्षीय श्रीराम, शाहगंज निवासी 71 वर्षीय जगदीश शर्मा, पलवल (हरियाणा) निवासी 57 वर्षीय रतन चौहान और रामबाग निवासी 72 वर्षीय सूरजभान शामिल हैं।
कुछ ने अपनों से मारपीट कर घर से निकालने की बात बताई
आश्रम अध्यक्ष शिव प्रसाद शर्मा ने बताया कि इन बुजुर्गों की परिस्थितियां अलग-अलग हैं। कुछ ने अपनों द्वारा मारपीट कर घर से निकाले जाने की बात बताई, जबकि कुछ को सिर्फ सहारे की जरूरत थी। आश्रम पहुंचने वाले राजेश अग्रवाल करीब दो दिन से भूखे थे। बुढ़ापे में जब उन्हें अपनों के सहारे और घर की रसोई की जरूरत थी, तब उन्हें आश्रम की चौखट पर आना पड़ा। आश्रम में उन्हें भोजन मिला, रहने की जगह मिली और देखभाल का भरोसा मिला। लेकिन एक प्रश्न रह गया कि जिस घर को कभी उन्होंने अपना बनाया था, आखिर उसी घर में उनके लिए जगह क्यों नहीं बची?
पितृपक्ष आया तो याद आए जीवित माता-पिता
इसी दर्द के बीच कहानी का दूसरा पक्ष उम्मीद से भरा था। 80 वर्षीय रोशन लाल सिंह और उनकी पत्नी गुड्डी देवी कुछ समय से वृद्धाश्रम में रह रहे थे। पितृपक्ष शुरू हुआ तो उनके बच्चों को अपने पूर्वजों के श्राद्ध पर अपने माता-पिता की याद आई और अपने व्यवहार का अहसास हुआ। शनिवार सुबह वे रामलाल वृद्धाश्रम पहुंचे और दोनों बुजुर्गों को सम्मान के साथ अपने घर ले गए। अब वे अपने माता-पिता के साथ रहकर पितरों का श्राद्ध करेंगे।
भावुक करने वाला क्षण आया सामने
वृद्धाश्रम में मौजूद लोगों के लिए यह क्षण भावुक करने वाला था। एक तरफ कुछ बुजुर्ग अपने बच्चों की राह देखते हुए आश्रम की चौखट पर पहुंचे थे, वहीं दूसरी ओर एक बुजुर्ग दंपती उसी चौखट से अपने घर लौट रहा था। पितृपक्ष में लोग उन पूर्वजों को याद करते हैं, जो अब उनके बीच नहीं हैं। उनके लिए तर्पण करते हैं, श्राद्ध करते हैं और उनकी आत्मा की शांति की प्रार्थना करते हैं।
वृद्धाश्रम की ये दोनों तस्वीरें इस परंपरा के बीच एक मानवीय सवाल छोड़ती हैं कि जिस माता-पिता ने बच्चे को उंगली पकड़कर चलना सिखाया, क्या बुढ़ापे में उसी की कांपती उंगली थामना सबसे बड़ा तर्पण नहीं है? रामलाल वृद्धाश्रम के विनय शर्मा, संदेश जैन, राजकुमार जैन, सुनील जैन और नंदकिशोर शर्मा मौजूद रहे।
यह भी पढ़ें- कैसे हुई संत प्रेमानंद के शिष्य रसिक दुलारी की मौत? 11 मिनट के CCTV में कैद! प्राइवेट पार्ट काटा
पितृपक्ष के पहले दिन यमुना घाटों पर उमड़ी श्रद्धा
शनिवार से पितृपक्ष आरंभ हो गया। सुबह से यमुना के घाटों पर श्रद्धालुओं की भीड़ रही। लोगों ने अपने पितरों के निमित्त तर्पण और अर्घ्य अर्पित किया। घरों में भी पितरों के लिए भोजन निकाला गया और परंपरा के अनुसार श्राद्ध कर्म शुरू हुए। पितृपक्ष के दौरान परिवार अपनी मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं।
