यूपी के मथुरा का राधाकुंड: अहोई अष्टमी पर संतान सुख की कामना लिए डुबकी लगाते हैं निसंतान दंपती
अहोई अष्टमी पर संतान प्राप्ति की कामना के साथ राधाकुंड में स्नान की सदियों पुरानी परंपरा है। मान्यता है कि ...और पढ़ें

सांकेतिक तस्वीर।
HighLights
राधाकुंड में अहोई अष्टमी पर संतान कामना स्नान।
निसंतान दंपतियों को संतान सुख की धार्मिक मान्यता।
भगवान कृष्ण और राधारानी से जुड़ा कुंड का इतिहास।
डिजिटल डेस्क, आगरा। अहोई अष्टमी पर संतान की मंगलकामना लेकर राधाकुंड में डुबकी लगाने की सदियों पुरानी परंपरा है। ब्रज की आध्यात्मिक धरा पर राधाकुंड केवल जलतीर्थ नहीं, बल्कि अगाध विश्वास और सदियों पुरानी आस्था का केंद्र है। धार्मिक मान्यता है कि अहोई अष्टमी की मध्यरात्रि में यहां स्नान करने से निसंतान दंपतियों को संतान सुख की प्राप्ति होती है। इसी विश्वास के चलते देश विदेश से दंपति यहां खिंचे चले आते हैं।
किसी के लिए यह सूनी गोद भरने की प्रार्थना है, तो किसी के लिए संतान प्राप्ति के बाद राधारानी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर। इस तरह राधाकुंड की रात में एक ओर भविष्य की उम्मीदें जल में उतरती हैं, तो दूसरी ओर पूरी हुई मनोकामनाओं का आभार छलकता है।
एक नवंबर को होगा स्नान
एक नवंबर की रात राधाकुंड में सिर्फ स्नान नहीं होगा, बल्कि कामनाओं की पुकार और पूरी हुई मुरादों के आभार का अनूठा संगम साकार होगा। दीपों से झिलमिलाते घाट, राधा नाम की अनुगूंज और श्रद्धा में झुके शीश इस रात को भावनाओं के ऐसे महासागर में बदल देंगे, जहां हर डुबकी एक मनौती होगी और हर प्रार्थना में राधारानी की कृपा पाने की आस।
जब श्रीकृष्ण ने दिया राधारानी को वरदान
राधाकुंड का इतिहास उतना ही अद्भुत है जितनी उसकी भक्ति की गहराई। पुराणों के अनुसार, यह स्थल पहले अरिष्टासुर की नगरी अरीठ वन थी। अरिष्टासुर की दहाड़ से गर्भवती स्त्रियों के गर्भ तक गिर जाते थे। जब श्रीकृष्ण ने बछड़े के रूप में आए उस राक्षस का वध किया, तो उन्हें गोहत्या का पाप लगा। प्रायश्चित स्वरूप उन्होंने अपनी बांसुरी से एक कुंड का निर्माण किया, जिसे सभी तीर्थों के जल से भरा गया। उसी तरह राधारानी ने अपने कंगन से दूसरा कुंड खोदा।
दोनों कुंड जब पवित्र जल से लबालब हो गए, तब श्रीकृष्ण ने राधारानी को वरदान दिया कि जो भी निसंतान दंपती अहोई अष्टमी की रात यहां स्नान करेगा, उसे वर्षभर में संतान का सुख अवश्य मिलेगा। इस चमत्कारिक प्रसंग का उल्लेख ब्रह्म पुराण और गर्ग संहिता के गिरिराज खंड में मिलता है।
संतान सुख की अनंत परंपरा
धार्मिक मान्यता है कि कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी की मध्यरात्रि में राधाकुंड में स्नान करने वाले निसंतान दंपती को संतान का वरदान मिलता है। स्नान के उपरांत एक पसंदीदा फल अर्पित करने और पेठा फल दान करने की प्रथा प्राचीन काल से चली आ रही है।
पंडित रामेश्वर वशिष्ठ बताते हैं, मान्यता है कि जो दंपती
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इस रात राधाकुंड में स्नान करते हैं, उनके घर जल्द ही किलकारियां गूंजने लगती हैं। यह आस्था का ऐसा संगम है, जो विज्ञान की सीमाओं को भी पार कर देता है।
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