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खेती की शिल्पकार बनीं जेन-जी शिल्पी सिकरवार, 200 बेटियों को दिखाया मुनाफे का रास्ता; बदली खेती की तस्वीर

Published: Sun, 11 Oct 2026 04:52 PM (IST)

शमशाबाद, आगरा की शिल्पी सिकरवार ने एग्रोनामी में मास्टर्स की डिग्री लेकर परंपरागत खेती को मुनाफे में बदला। उन्होंने 200 ...और पढ़ें

खेत में ट्रैक्टर से जोताई करतीं जेनजी किसान शिल्पी सिकरवार।

खेत में ट्रैक्टर से जोताई करतीं जेनजी किसान शिल्पी सिकरवार।

HighLights

  1. शिल्पी सिकरवार ने एग्रोनामी में मास्टर्स कर खेती को बनाया लाभदायक।

  2. परंपरागत खेती में बदलाव कर जैविक विधि से बढ़ाया उत्पादन।

  3. 200 से अधिक महिलाओं को जोड़कर बनाया किसान उत्पादक संगठन।

अली अब्बास, आगरा। बचपन से पिता को खेत में पसीना बहाते देखा और मौसम की मार पर आंसू बहाते भी। कभी घाटा होता तो कभी मुनाफा। खेती से परिवार की गाड़ी सरपट दौड़ नहीं पाती थी। इस स्थिति में पढ़ाई में तेज जेन-जी बेटी ने खेती में कुछ नया करने की ठानी।

चूंकि, यह क्षेत्र पुरुष प्रधान माना जाता है, ऐसे में उसके लिए राह आसान नहीं थीं, लेकिन उसने एग्रोनामी में मास्टर्स की डिग्री हासिल करने के बाद नौकरी की तलाश छोड़ अपने खेतों को चुना। और परंपरागत खेती को मुनाफे में बदल दिया।

वह यहीं नहीं रुकी। उसने फिर सशक्तीकरण की राह तैयार की और किसान उत्पादक समूह बनाकर अपने जैसी किसान की बेटियों को भी खेती से जोड़ना शुरू कर दिया। वर्तमान में करीब गांव की 200 बेटियां अब खेतों में कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं।

खेत पर बंटाती हैं पिता का हाथ

ये कहानी है शमसाबाद के बड़ा गांव के रहने वाले किसान नरेश सिकरवार की 26 वर्षीय बेटी शिल्पी की। तीन बहनों और दो भाइयों में चौथे नंबर की शिल्पी की खेती में पहले से रुचि थी। पिता के साथ खेत पर जातीं और हाथ बंटातीं। इसके बाद कृषि विज्ञान में पढ़ाई करने का तय किया।

Shilpi Sikarwar agra

2021 में एमएससी एग्रोनामी की पढ़ाई पूरी करने के बाद वापस खेत की राह पकड़ ली। इसके बाद कृषि में कुछ नया करने की ठानी। पिता की परंपरागत खेती में बदलाव की सोच के साथ कृषि विज्ञानियों से सहयोग लिया। तीन एकड़ में आलू की फसल के साथ ही मूंग, कद्दू, खीरा, टमाटर समेत अन्य मौसमी सब्जियां उगाना शुरू किया। इससे मुनाफा दिखने लगा। इसके बाद सहजन की खेती की योजना बनाई।

शिल्पी सिकरवार बताती हैं कि सब्जियों के लिए जैविक खाद का प्रयोग शुरू किया। इससे सब्जियों के उत्पादन के साथ-साथ मुनाफा भी बढ़ा। शिल्पी खुद ट्रैक्टर चलाती हैं और बुवाई से लेकर कटाई और मंडियों में बिक्री का काम भी खुद देखती हैं।

कल तक जो सवाल उठाते थे, वही अब बेटियों से लेते हैं सलाह

अपने प्रयासों में सफल होने के बाद शिल्पी ने महिला सशक्तीकरण की दिशा में पहल की। दो साल पहले उन्होंने किसान उत्पादक संगठन बनाया। वर्तमान में दो सौ से ज्यादा सदस्य बन गए हैं। शिल्पी बताती हैं कि वह अपनी जैसी बेटियों और गांव की महिलाओं को मुनाफे की खेती के लिए प्रेरित करती हैं। संगठन से जुड़ी लड़कियां और महिलाएं टमाटर, लौकी से कैश क्राप कर रही हैं। जो लोग कल तक उन्हें लेकर सवाल उठाते थे, आज वही खेती को किस तरह से लाभ में बदला जाए, इसकी सलाह लेते हैं।

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