बांका में बांस से बदलेगी किसानों की तकदीर, 50 एकड़ में खेती की तैयारी, 180 किसानों और कारीगरों को मिलेगा प्रशिक्षण
बांका जिले में 'नेशनल बंबू मिशन' के तहत किसानों की आय बढ़ाने और रोजगार सृजन के लिए 50 एकड़ में ...और पढ़ें

एआई से निर्मित सांकेतिक तस्वीर
HighLights
'नेशनल बंबू मिशन' के तहत 50 एकड़ में बांस की खेती।
किसानों को 50% अनुदान और रोजगार के नए अवसर।
180 किसानों-कारीगरों को बांस शिल्प का विशेष प्रशिक्षण।
संवाद सूत्र, बांका। किसानों की आमदनी में इजाफा करने, पारंपरिक कृषि को एक लाभप्रद व्यावसायिक विकल्प देने और स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए द्वार खोलने के उद्देश्य से उद्यान विभाग ने एक महत्वपूर्ण पहल की है।
'नेशनल बंबू मिशन' के तहत अब बांका जिले के खेतों में न सिर्फ बांस के पौधे लहलहाएंगे, बल्कि उससे तैयार होने वाली आकर्षक कलाकृतियों और हस्तशिल्प उत्पादों से स्थानीय बाजार भी गुलजार होंगे।
इस महत्वाकांक्षी योजना के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए वित्तीय वर्ष 2026-27 के अंतर्गत जिले के लिए 9.62 लाख रुपये की राशि स्वीकृत की गई है, जिसके जरिए लगभग 50 एकड़ क्षेत्र में बांस की वैज्ञानिक खेती कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
उद्यान विभाग के अनुसार, इस योजना का लाभ बड़े किसानों के साथ-साथ छोटे और सीमांत किसानों को भी सुगमता से मिलेगा। इसके तहत किसान न्यूनतम 10 डिसमिल से लेकर अधिकतम 50 डिसमिल तक की भूमि पर बांस की खेती कर सकते हैं।
योजना के प्रावधान के अनुसार चयनित किसानों को कुल लागत का 50 प्रतिशत अनुदान (सब्सिडी) दिया जाएगा, जिसकी अधिकतम सीमा 36 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर तय की गई है। यदि वास्तविक लागत निर्धारित इकाई लागत से कम होगी, तो किसान को वास्तविक लागत का आधा हिस्सा अनुदान के रूप में प्रदान किया जाएगा।
इस पहल से चांदन, कटोरिया, बौंसी, बेलहर और फुल्लीडुमर प्रखंड के वैसे इलाकों की जमीनों का बेहतर उपयोग हो सकेगा, जहां खरीफ या रबी सीजन में पारंपरिक फसलों की पैदावार कम होती है।
बंबू क्राफ्ट और डिजाइनिंग का मिलेगा प्रशिक्षण; 180 किसानों व कामगारों का होगा चयन
इस योजना का मुख्य उद्देश्य केवल बांस की पैदावार बढ़ाना ही नहीं, बल्कि बांस आधारित कलाकृतियों और कॉटेज इंडस्ट्री (हस्तशिल्प उद्योग) को बढ़ावा देना भी है।
इसके लिए जिले के 180 प्रगतिशील किसानों और पारंपरिक कारीगरों को बंबू क्राफ्ट, आधुनिक डिजाइनिंग और उद्यमिता का विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा, जिस पर 1.80 लाख रुपये खर्च किए जाएंगे।
इसके अलावा, किसानों तक तकनीकी जानकारियां और खेती के उन्नत तौर-तरीके सुगमता से पहुंचाने के लिए जिले के 50 क्षेत्रीय प्रसार कर्मियों को भी प्रशिक्षित किया जाएगा, जिसके लिए 50 हजार रुपये का प्रावधान किया गया है।
समय के साथ घटी थी खेती, उद्यान विभाग की पहल से फिर जगी उम्मीद
जिले में लंबे समय से व्यावसायिक स्तर पर बांस की खेती सिमटती जा रही थी। ग्रामीण इलाकों में तालाबों के किनारे या छुटपुट जगहों पर ही सीमित रकबे में बांस के झुंड नजर आते हैं।
स्थानीय किसान मुरारी सिंह ने बताया कि पहले के समय में किसान अपने खेतों की मेड़ या आसपास बांस अवश्य लगाते थे, लेकिन समय के साथ इस तरफ से लोगों का रुझान कम होने लगा था। अब उद्यान विभाग द्वारा उठाए गए इस कदम से एक बार फिर बांस की खेती को ग्रामीण आर्थिकी में पुनर्जीवित करने का मजबूत अवसर मिला है।
