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बांका में मशरूम उत्पादन से बदली तकदीर, आत्मनिर्भरता की मिसाल बनीं कुंदनी, अब दूसरी महिलाओं को भी सिखा रहीं हुनर

Published: Sun, 11 Oct 2026 06:58 AM (IST)

बांका के फुल्लीडुमर प्रखंड की कुंदनी कुमारी ने सामाजिक रूढ़ियों को तोड़कर मशरूम उत्पादन से आत्मनिर्भरता हासिल की है। वह ...और पढ़ें

बांका के फुल्लीडुमर में मशरूम उत्पादन कर आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश करतीं महिला उद्यमी कुंदनी कुमारी

बांका के फुल्लीडुमर में मशरूम उत्पादन कर आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश करतीं महिला उद्यमी कुंदनी कुमारी

HighLights

  1. कुंदनी कुमारी ने मशरूम उत्पादन से हासिल की आत्मनिर्भरता।

  2. सामाजिक बाधाओं को पार कर बनीं महिलाओं की प्रेरणा।

  3. सबौर कृषि विश्वविद्यालय से प्रशिक्षण लेकर दूसरों को सिखा रहीं।

संवाद सूत्र, फुल्लीडुमर (बांका)। आत्मनिर्भरता और संघर्ष की एक प्रेरणादायक दास्तान बांका जिले के फुल्लीडुमर प्रखंड अंतर्गत करहरिया गांव से सामने आई है। यहां की निवासी कुंदनी कुमारी ने समाज के ताने-बाने, अशिक्षा और 'महिलाओं के घर की चारदीवारी तक सीमित रहने' जैसी रूढ़िवादी सोच को दरकिनार करते हुए अपनी कड़ी मेहनत के बल पर स्वावलंबन की एक नई इबारत लिख डाली है।

  • बांका जिले के फुल्लीडुमर प्रखंड के करहरिया गांव की निवासी कुंदनी कुमारी ने सामाजिक बंदिशों और चुनौतियों को पार कर हासिल की सफलता

  • भागलपुर के सबौर कृषि विद्यालय और कृषि विज्ञान केंद्र से मशरूम उत्पादन, बकरी पालन तथा सिलाई-कटाई का प्राप्त किया है प्रशिक्षण

  • पति के सहयोग से उत्पादित मशरूम को सही बाजार तक पहुंचा रही हैं कुंदनी; उनकी सफलता से प्रेरित होकर क्षेत्र की दर्जनों महिलाएं सीख रही हैं हुनर

  • दृढ़ इच्छाशक्ति और कठिन परिश्रम के बल पर ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने की दिशा में बढ़ा रही हैं कदम

कभी लोगों के उपहास और पारिवारिक बाधाओं का सामना करने वाली कुंदनी आज क्षेत्र की सैकड़ों महिलाओं और युवतियों के लिए एक मजबूत प्रेरणास्रोत बन चुकी हैं। वह न केवल खुद मशरूम का सफल उत्पादन कर रही हैं, बल्कि अन्य महिलाओं को भी आर्थिक रूप से मजबूत बनाने का बीड़ा उठाया है।

सबौर कृषि विद्यालय से लिया प्रशिक्षण; तीन साल के कड़े संघर्ष से हासिल की दक्षता

अपने सपनों को धरातल पर उतारने के लिए कुंदनी ने कृषि विज्ञान केंद्र और भागलपुर स्थित प्रसिद्ध सबौर कृषि विद्यालय से मशरूम उत्पादन का विधिवत प्रशिक्षण प्राप्त किया।

लगातार तीन वर्षों के अथक प्रयास, बार-बार आने वाली असफलताओं और तकनीकी बारीकियों को सीखने के बाद उन्होंने इस कृषि आधारित व्यवसाय में पूर्ण दक्षता हासिल की।

मशरूम उत्पादन के साथ-साथ उन्होंने अपनी आजीविका के दायरे को बढ़ाते हुए बकरी पालन और सिलाई-कटाई का हुनर भी सीखा। शुरुआती दौर में उन्हें सामाजिक बंदिशों के कारण कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी और अपने लक्ष्य पर डटी रहीं।

पति का मिला अनमोल सहयोग; क्षेत्र की दर्जनों महिलाओं को सिखा रही हैं आत्मनिर्भरता के गुर

कुंदनी की इस सफलता के सफर में उनके जीवनसाथी (पति) का भी अहम योगदान रहा है। एक निजी विद्यालय में शिक्षक होने के बावजूद उनके पति समय निकालकर उत्पादित मशरूम को बाजार तक पहुंचाने और आवश्यक सामग्री जुटाने में उनकी पूरी मदद करते हैं।

कुंदनी की इस अनुकरणीय मेहनत और सफलता को देखकर अब आसपास के गांवों की दर्जनों महिलाएं और युवतियां भी आगे आ रही हैं। वे कुंदनी से मशरूम उत्पादन और स्वरोजगार के गुर सीख रही हैं।

कुंदनी का मानना है कि यदि महिलाओं के पास दृढ़ इच्छाशक्ति, सही प्रशिक्षण और मेहनत का जज्बा हो, तो वे किसी भी परिस्थिति में अपने पैरों पर खड़ी होकर समाज में एक सम्मानजनक जीवन जी सकती हैं।

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