नफरत हारी, शिक्षा जीती: बांका की खुशबू कुमारी ने बदल दी सुदूर गांव की तकदीर, मिला राष्ट्रीय सम्मान
प्रधान शिक्षिका खुशबू कुमारी को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया है। उन्होंने बांका के बिदायडीह ...और पढ़ें

दिल्ली में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से पुरस्कार प्राप्त करतीं खुशबू कुमारी। सौ. स्वयं
HighLights
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने खुशबू कुमारी को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार दिया।
बिदायडीह गांव में शिक्षा और सामाजिक समरसता को बढ़ावा दिया।
बच्चों की उपस्थिति 50% से बढ़ाकर 90% के पार की।
राहुल कुमार, बांका। शिक्षक जब अपनी कक्षा की चारदीवारी से बाहर निकलकर समाज की विसंगतियों से टकराने का साहस करता है, तो बदलाव की गूंज राष्ट्रीय पटल तक सुनाई देती है।
बिहार में बांका जिले के सुदूर गांव बिदायडीह की प्राथमिक विद्यालय की प्रधान शिक्षिका खुशबू कुमारी ने शिक्षा को केवल साक्षरता का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और राष्ट्र निर्माण का हथियार बना दिया है।
गतिविधि-आधारित शिक्षण और समावेशी शिक्षा के उनके इसी प्रयास के लिए शिक्षक दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने उन्हें प्रतिष्ठित राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया है।

बिदायडीह गांव की पहचान कुछ समय पहले तक अशिक्षा, निर्धनता और सांप्रदायिक कटुता थी। यह महादलित और मुस्लिम बहुल बस्ती प्रायः आपसी संघर्षों में उलझी रहती थी। जब खुशबू ने यहां प्रधान शिक्षिका का दायित्व संभाला तो उनके समक्ष सबसे बड़ी चुनौती टूटे हुए सामाजिक ताने-बाने को जोड़ते हुए शिक्षा का विस्तार करना था।
उन्होंने स्कूल में बैठने के बजाय बस्ती की पगडंडियों को चुना। घर-घर जाकर अभिभावकों से सीधा संवाद किया। इसका परिणाम है कि पिछले एक वर्ष से गांव में कोई सांप्रदायिक विवाद नहीं हुआ है। अब स्कूल के प्रांगण में अब्दुल और रहमान की कन्हैया और अमन के साथ प्रगाढ़ मित्रता देखते ही बनती है।

दिहाड़ी मजदूरी करने वाले परिवारों को शिक्षा के प्रति जागरूक करना आसान नहीं था, लेकिन खुशबू के 'डोर-टू-डोर' अभियान से यह संभव हो गया। महज कुछ महीनों में ही विद्यालय में बच्चों की उपस्थिति 50 प्रतिशत से छलांग लगाकर 90 प्रतिशत के पार हो गई।
उन्होंने अभिभावकों को प्रेरित करने के लिए संसाधनों के घोर अभाव के बावजूद, अपने खर्च पर बच्चों को जूते-मोजे, टाई-बेल्ट और पहचान-पत्र उपलब्ध कराए। मात्र छह महीने के भीतर बिदायडीह का यह सरकारी स्कूल एक ऐसा आदर्श विद्यालय बन गया, जहां शत-प्रतिशत बच्चे पूरी यूनिफार्म में आते हैं।
बच्चों के लिए शिक्षा को बनाया उत्सव:
खुशबू का स्पष्ट मानना है कि प्राथमिक स्तर पर पढ़ाई बच्चों के लिए बोझ नहीं, एक आनंदमय उत्सव होनी चाहिए। बुनियादी साक्षरता और संख्या ज्ञान को मजबूत करने के लिए उन्होंने शून्य निवेश वाली शिक्षण सामग्री और तकनीक का बेहतरीन उपयोग किया।
उनके द्वारा विकसित 'मात्रा का ज्ञान हुआ आसान' नवाचार की बिहार के मुख्यमंत्री ने स्वयं सराहना की और इसे राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली। कटोरिया के कठौन स्कूल में तैनाती के दौरान भी 'चहक' योजना के तहत गीत-संगीत से पढ़ाने के उनके तरीके काफी लोकप्रिय हुए थे।
आज डिजिटल माध्यमों के जरिये उनकी यह नवोन्मेषी शिक्षण पद्धति देशभर के आठ लाख से अधिक शिक्षकों और अभिभावकों तक पहुंच रही है।

विद्यालय में 'बाल संसद' और 'इको क्लब' की स्थापना:
खुशबू कुमारी केवल अक्षर ज्ञान तक सीमित नहीं हैं। बच्चों में नेतृत्व क्षमता और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का भाव जगाने के लिए उन्होंने विद्यालय में 'बाल संसद' और 'इको क्लब' की स्थापना की है।
ग्रामीण परिवेश की झिझक तोड़ते हुए उन्होंने माहवारी स्वच्छता प्रबंधन, बाल सुरक्षा और 'गुड टच-बैड टच' जैसे संवेदनशील विषयों पर निरंतर जागरूकता अभियान चलाए।
इसी सर्वांगीण विकास का प्रतिफल है कि इस सुदूर गांव के बच्चे अब राष्ट्रीय आय सह मेधा छात्रवृत्ति जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाओं में सफलता के झंडे गाड़ रहे हैं।
