पहली बार शुरू कर रहे हैं व्लॉगिंग? कैमरा, लेंस और माइक्रोफोन चुनने का सही तरीका जानें
व्लॉगिंग अब कमाई का एक लोकप्रिय जरिया बन गया है, जिसके लिए सही उपकरण और सेटिंग्स जानना ज़रूरी है। एक ...और पढ़ें

पहली बार शुरू कर रहे हैं व्लॉगिंग? कैमरा, लेंस और माइक्रोफोन चुनने का सही तरीका जानें
HighLights
व्लॉगिंग कैमरे में फ्लिप स्क्रीन, ऑटोफोकस, 4K रिकॉर्डिंग जरूरी।
वाइड एंगल और जूम लेंस व्लॉगिंग के लिए उपयुक्त होते हैं।
साफ आवाज के लिए एक्सटर्नल माइक्रोफोन का उपयोग करें।
टेक्नोलॉजी डेस्क, नई दिल्ली। आज के दौर में व्लागिंग सिर्फ वीडियो बनाने का शौक नहीं रह गया है, बल्कि यह कमाई का बढ़िया जरिया बन चुका है। आज आप देखें, तो यूट्यूब, इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म पर ट्रैवल, लाइफस्टाइल, फूड, टेक्नोलाजी और डेली रूटीन से जुड़े व्लाग खूब पसंद किए जाते हैं। हालांकि अच्छी व्लागिंग के लिए सिर्फ वीडियो रिकार्ड करना ही काफी नहीं है। इसके लिए सही कैमरा, बेहतर आडियो क्वालिटी, अच्छी लाइटिंग और कैमरे की सेटिंग्स की जानकारी भी जरूरी है।
व्लागिंग कैमरा के जरूरी फीचर्स
फ्लिप स्क्रीन: व्लागिंग कैमरे में फ्लिप या घूमने वाली स्क्रीन बढ़िया मानी जाती है। इसकी मदद से आप कैमरे के सामने खड़े होकर खुद को स्क्रीन पर देख सकते हैं और आसानी से अपना फ्रेम सेट कर सकते हैं। खासकर तब जब आप अकेले व्लागिंग कर रहे हैं।
ऑटोफोकस : कैमरे में फेज डिटेक्शन ऑटोफोकस के साथ फेस और आई ट्रैकिंग की सुविधा होनी चाहिए। इससे कैमरा आपके चेहरे और आंखों पर फोकस बनाए रखता है। अगर आप चलते हुए कैमरे से बात कर रहे हैं या रिकॉर्डिंग के दौरान अपनी जगह बदलते हैं, तो भी कैमरा आपके चेहरे को फोकस में रखने की कोशिश करता है।
इमेज स्टेबलाइजेशन: इन-बाडी इमेज स्टेबलाइजेशन भी काफी काम का फीचर है। यह रिकॉर्डिंग के दौरान कैमरे के हिलने से होने वाले कंपन को कम करने में मदद करता है। खासकर पैदल चलते हुए वीडियो बनाने या बिना ट्राइपाड के रिकॉर्डिंग करने में इसका फायदा मिलता है।
4K वीडियो रिकॉर्डिंग : वीडियो रिकॉर्डिंग के लिए कम से कम 4K रिजाल्यूशन और 30 फ्रेम प्रति सेकंड का सपोर्ट होना चाहिए। 4K वीडियो की मदद से एडिटिंग के दौरान फुटेज को क्राप या रीफ्रेम करने की सुविधा मिलती है।
रिकॉर्डिंग टाइम: कुछ कैमरों में एक बार में 30 मिनट तक की रिकॉर्डिंग की सीमा होती है, जबकि नए माडल में यह सीमा नहीं होती है। लंबे इंटरव्यू या लगातार वीडियो रिकार्ड करने वालों के लिए बिना समय सीमा वाली रिकॉर्डिंग का विकल्प उपयोगी है।
बैटरी बैकअप: बैटरी बैकअप भी उतना ही जरूरी है। अगर कैमरा लगातार रिकॉर्डिंग के दौरान 45 मिनट में ही बंद हो जाता है, तो आपको अतिरिक्त बैटरी साथ रखनी पड़ेगी। इसलिए कैमरा खरीदते समय उसकी वास्तविक रिकॉर्डिंग अवधि जरूर चेक करें।
कैमरे का आकार: हल्का और कांपैक्ट कैमरा कहीं भी ले जाना आसान होता है। ट्रैवल व्लागिंग करने वालों के लिए ऐसा कैमरा ज्यादा उपयोगी है, जिसे आसानी से बैग में रखा जा सके।
व्लागिंग के लिए सही लेंस कैसे चुनें
जब आप कैमरे को हाथ में पकड़कर खुद की रिकॉर्डिंग करते हैं, तो वाइड एंगल लेंस काफी उपयोगी होता है। इससे कम दूरी पर कैमरा रखने के बावजूद आपका चेहरा और पीछे का कुछ हिस्सा आसानी से फ्रेम में आ जाता है। आमतौर पर 16एमएम से 18एमएम के बराबर फोकल लेंथ वाला लेंस अच्छा विकल्प है। वहीं अगर आप ट्राइपाड पर कैमरा लगाकर बैठकर वीडियो रिकार्ड करते हैं और कैमरा आपसे करीब एक से दो मीटर दूर रहता है, तो 24एमएम से 35एमएम के बराबर फोकल लेंथ वाला लेंस उपयोग कर सकते हैं।
इससे चेहरे की फ्रेमिंग बेहतर दिखाई देती है। बात ट्रैवल और लाइफस्टाइल व्लागिंग की करें, तो इसके लिए 16एमएम से 55एमएम के बराबर फोकल लेंथ वाला जूम लेंस अच्छा विकल्प है। इससे अलग-अलग तरह के शाट लेने के लिए बार-बार लेंस बदलने की जरूरत नहीं पड़ती है। प्राइम लेंस में फोकल लेंथ तय होती है और आमतौर पर ये ज्यादा रोशनी कैप्चर करने में सक्षम होते हैं।
दूसरी तरफ, जूम लेंस में फोकल लेंथ बदली जा सकती है, जिससे अलग-अलग दूरी और एंगल से वीडियो बनाना आसान होता है। शुरुआती व्लागर्स के लिए कैमरे के साथ मिलने वाला किट लेंस ही पर्याप्त हो सकता है। वहीं अगर अगर आपके कैमरे में एपीएस-सी सेंसर है, तो फोकल लेंथ का हिसाब फुल-फ्रेम कैमरे से अलग होता है। इसमें आमतौर पर फोकल लेंथ को 1.5 से गुणा करके उसके बराबर फुल-फ्रेम फोकल लेंथ निकाली जाती है। उदाहरण के लिए, 10एमएम का एपीएस-सी लेंस लगभग 15एमएम फुल-फ्रेम लेंस के बराबर विजुअल एरिया देता है।
आडियो क्वालिटी का ध्यान रखें
व्लागिंग में अच्छी वीडियो क्वालिटी के साथ साफ आवाज होना भी बहुत जरूरी है। कैमरे में पहले से मौजूद माइक्रोफोन हर स्थिति में साफ आवाज रिकार्ड नहीं कर पाता है। इसमें कैमरे की मोटर, हाथ से पकड़ने के दौरान होने वाली आवाज, हवा और आसपास का शोर भी रिकार्ड हो सकता है। ऐसे में एक्सटर्नल माइक्रोफोन बेहतर विकल्प है।
वहीं स्टूडियो या शांत जगह पर रिकॉर्डिंग के लिए आप शाटगन माइक्रोफोन का उपयोग कर सकते हैं। इसे कैमरे के ऊपर लगाया जाता है। इसके अलावा, आजकल वायरलेस माइक्रोफोन भी काफी चलन में है। इसे कपड़ों पर क्लिप किया जाता है और यह वायरलेस तरीके से कैमरे से जुड़ता है।
सिंगल व्लागिंग करने वालों के लिए यह काफी उपयोगी है, क्योंकि कैमरा आपसे दूर होने पर भी आपकी आवाज साफ रिकार्ड होती है। अगर आपका बजट कम है, तो शुरुआत में कैमरे के इन-बिल्ट माइक्रोफोन से काम चला सकते हैं, लेकिन बेहतर आडियो के लिए बाद में एक्सटर्नल माइक्रोफोन अच्छा रहता है।
व्लागिंग कैमरा का उपयोग कैसे करें
व्लागिंग कैमरा का उपयोग करने के लिए सही सेटिंग्स की जानकारी होना जरूरी है।
वीडियो रिजाल्यूशन: सामान्य व्लागिंग के लिए 4K रिजाल्यूशन और 30 एफपीएस अच्छा विकल्प है। इससे वीडियो की क्वालिटी बेहतर रहती है और एडिटिंग के दौरान फुटेज को क्राप करने की सुविधा मिलती है।
फ्रेम रेट: अगर आप सिनेमैटिक लुक चाहते हैं, तो 24 एफपीएस पर रिकॉर्डिंग कर सकते हैं। वहीं, स्लो मोशन वीडियो बनाने के लिए 60 एफपीएस का उपयोग किया जा सकता है। 60 एफपीएस पर रिकार्ड किए गए वीडियो को 30 एफपीएस की एडिटिंग टाइमलाइन में आधी स्पीड से चलाने पर स्मूद स्लो मोशन मिलता है।
शटर स्पीड: शटर स्पीड वीडियो में मूवमेंट के दौरान आने वाले धुंधलेपन को नियंत्रित करती है। इसके लिए 180 डिग्री नियम का उपयोग किया जाता है। इस नियम के अनुसार शटर स्पीड को फ्रेम रेट से लगभग दोगुना रखना चाहिए। 30 एफपीएस के लिए 1/60 सेकंड, 24 एफपीएस के लिए 1/50 सेकंड और 60 एफपीएस के लिए 1/120 सेकंड की शटर स्पीड रख सकते हैं।
एनडी फिल्टर: तेज धूप में सही शटर स्पीड रखने पर वीडियो ज्यादा चमकीला दिखाई दे सकता है। ऐसी स्थिति में एनडी फिल्टर का उपयोग किया जा सकता है। यह लेंस तक पहुंचने वाली रोशनी को कम करता है और शटर स्पीड को सही स्तर पर बनाए रखने में मदद करता है।
आइएसओ सेटिंग: आइएसओ कैमरे के सेंसर की रोशनी के प्रति संवेदनशीलता को नियंत्रित करता है। कोशिश करें कि आइएसओ को कैमरे की सामान्य या नेटिव आइएसओ वैल्यू के आसपास रखें। बहुत ज्यादा आइएसओ करने पर वीडियो में डिजिटल शोर दिखाई देने लगता है। कम रोशनी में आइओएस बढ़ाने के बजाय बेहतर लाइटिंग का इंतजाम करना ज्यादा उपयोगी हो सकता है।
स्टैंडर्ड पिक्चर प्रोफाइल: अगर आप वीडियो एडिटिंग और कलर ग्रेडिंग के बारे में ज्यादा नहीं जानते हैं, तो स्टैंडर्ड या न्यूट्रल पिक्चर प्रोफाइल का उपयोग करें। इसमें रिकार्ड किया गया वीडियो सीधे कैमरे से उपयोग करने के लिए बेहतर दिखाई देता है और ज्यादा एडिटिंग की जरूरत नहीं पड़ती है।
लाग पिक्चर प्रोफाइल: अगर आपको वीडियो की कलर ग्रेडिंग करनी आती है, तो लाग या फ्लैट पिक्चर प्रोफाइल चुन सकते हैं। इसमें वीडियो रिकॉर्ड होने के बाद रंग थोड़े फीके और कम कंट्रास्ट वाले दिखाई देते हैं, लेकिन एडिटिंग के दौरान रंगों और रोशनी को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है।
फेस और आई ट्रैकिंग: कैमरे की ऑटोफोकस सेटिंग में फेस डिटेक्शन या आई ट्रैकिंग विकल्प को आन रखें। इससे रिकॉर्डिंग के दौरान कैमरा आपके चेहरे और आंखों पर फोकस बनाए रखने की कोशिश करेगा।
कंटीन्यूअस ऑटोफोकस : अगर कैमरे में कंटीन्यूअस ऑटोफोकस का विकल्प है, तो उसका उपयोग करें। इससे रिकॉर्डिंग के दौरान कैमरा लगातार फोकस करता रहता है। खासकर चलते हुए या कैमरे के सामने बोलते समय यह फीचर काफी मददगार साबित होता है।
अगर आप पहली बार व्लागिंग शुरू कर रहे हैं, तो महंगे कैमरे और ढेर सारे उपकरण खरीदने की जरूरत नहीं है। शुरुआत में एक अच्छा कैमरा, किट लेंस, एक्सटर्नल माइक्रोफोन और ट्राइपाड पर्याप्त हो सकते हैं।
यह भी पढ़ें- iOS 27.3 का पहला बीटा अपडेट जारी, Siri AI से लेकर Health App तक मिलेंगे कई शानदार फीचर्स
देश और दुनिया की ताजा खबरों के लिए Hindi News देखें। Live Cricket Score , IPO Listings, Shiv Chalisa, राशिफल और दुर्गा चालीसा पर अन्य जानकारी पाएं।