सिर्फ बैंक बैलेंस नहीं, ये 5 चीजें भी बनाती हैं आपको धनवान; धनतेरस पर समझें असली धन
धन त्रयोदशी मात्र आर्थिक समृद्धि का ही पर्व नहीं, यह आध्यात्मिक उन्नति का पर्व है। हमारे ऋषियों ने जीवन, स्वास्थ्य, ...और पढ़ें
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धनतेरस: श्री श्री रवि शंकर बताते हैं कैसे जीवन, कृतज्ञता और संतोष है आपका सच्चा धन
श्री श्री रवि शंकर, आर्ट आफ लिविंग के प्रणेता आध्यात्मिक गुरु। धन त्रयोदशी (धनतेरस) से दीपावली के उत्सव का आरंभ होता है। सामान्य रूप से धन त्रयोदशी को आर्थिक समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है, किंतु वैदिक ज्ञान में धन को केवल बहुमूल्य धातुओं या मुद्रा के संचय तक ही सीमित नहीं रखा गया है। प्राचीन मनीषियों ने धन को बहुत ही व्यापक और अनूठे ढंग से प्रस्तुत किया है। हमारा उत्साह और तेज भी धन है। प्रकृति से मिलने वाली वायु और सूर्य का प्रकाश भी अमूल्य संपदा है। आज हम जानते है कि वायु और सूर्य के प्रकाश को विद्युत में परिवर्तित कर एक संपदा की तरह किस प्रकार उपयोग किया जाना चाहिए।
जीवन भी धन है, यदि जीवन ही नहीं है तो फिर सब कुछ अर्थहीन है। जीवन की शक्ति या प्राण ऊर्जा जिसे वसु भी कहा गया है, धन है। जब यह बोध जाग्रत होता है कि जीवन ही वास्तविक धन है तो मन में धन्यभागी होने का भाव उदित होता है। जीवन के प्रति और जो कुछ हमें प्रकृति से प्राप्त हुआ है, उसके प्रति कृतज्ञ होना ही वास्तविक धन है।
जो सदैव अभाव की मानसिकता में रहते हैं, उन्हें जीवन में उपलब्ध अवसरों और संपदाओं का भी पूरा बोध नहीं होता है। इसके विपरीत जो जीवन के प्रति धन्यवाद का भाव रखते हैं, जो प्राप्त है उसके प्रति कृतज्ञ होते हैं, वे अधिक समृद्ध होने की पात्रता प्राप्त करते हैं। धन्यभागी या कृतज्ञ होना ही सच्चा धन है। धनतेरस पर हम अपनी अर्जित धन-संपदा को एकत्रित कर उसकी पूजा करते हैं। यह परंपरा हमें अपनी उपलब्धियों और संसाधनों का सम्मान करना सिखाती है। जब हम अपने पास उपलब्ध संपदा को पहचानते हैं और उसके प्रति कृतज्ञ होते हैं, तब अभाव की भावना कम होती है और लोभ के स्थान पर संतोष का भाव विकसित होता है।
धनतेरस आयुर्वेद के उद्गम का पर्व भी है। मान्यता है कि इस दिन भगवान धन्वंतरि द्वारा विश्व के लोगों को आयुर्वेद का ज्ञान प्रदान किया गया था। आयुर्वेद ने हमें स्वयं को सशक्त बनाए रखने के लिए जड़ी-बूटियों का प्रचुर ज्ञान तथा विभिन्न रसायनों की जानकारी दी है। आयुर्वेद केवल रोगों के उपचार का विज्ञान नहीं, बल्कि समग्र कल्याण को प्राप्त करने का विज्ञान है। अपने शरीर को सुदृढ़ और रोग प्रतिरोधक क्षमता को अत्यंत मजबूत रखना आवश्यक है, लेकिन इसके साथ-साथ एक शांतिपूर्ण और सुखी समाज के लिए मानसिक स्वास्थ्य की ओर ध्यान देना भी अत्यंत आवश्यक है। प्रसन्नता स्वास्थ्य का ही एक अंग है। जब तक लोग प्रसन्न नहीं हैं, उन्हें वास्तव में स्वस्थ नहीं माना जा सकता। पूर्ण स्वास्थ्य का अर्थ है कि वे प्रसन्न, प्रेमपूर्ण और करुणामय हैं। ये सभी गुण हमारी चेतना में अंतर्निहित हैं, आवश्यकता तो केवल इस बात की है कि हम अपने जीवन में सकारात्मकता को बढ़ाएं और इन्हें विकसित और अभिव्यक्त होने का अवसर दें।
धनतेरस वह पर्व है, जहां आप सबसे पहले अपनी चेतना में यह बीज बोते हैं कि आप संपन्न हैं और आपके पास प्रचुरता है। एक विचार के रूप में आपके भीतर प्रचुरता का यह भाव, भौतिक जीवन में भी प्रचुरता के रूप में ही प्रकट होगा। जब जीवन में बोध और ज्ञान रूपी दीपक प्रकाशित होता है तो तृप्ति का भाव जाग्रत होता है और लोभ, दरिद्रता का अंधकार मिट जाता है। तृप्ति या प्रचुरता अनुभव करने का अर्थ आलस्य का समर्थन नहीं है। अभाव की भावना से प्रेरित होकर कार्य करने तथा प्रचुरता और संतोष के भाव के साथ कार्य करने के इस अंतर को स्मरण रखना आवश्यक है। जीवन में प्राप्त धन व संपदा के प्रति हमें कृतज्ञ होना चाहिए व इसका सदुपयोग करना चाहिए।
जीवन का रसपूर्ण होना भी धन है। हमारी आत्मचैतन्य सत्ता जीवन के सभी रसों का मूल स्रोत है। उस मूल स्रोत तक पहुंचने का मार्ग अध्यात्म है। जब हम अध्यात्म को अपने जीवन का आधार बनाते हैं तो अन्य सभी संपत्ति व योग्यताएं सहजता से प्राप्त होने लगती हैं।
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