दीपावली सिर्फ दीप जलाने का त्योहार नहीं, जानिए अंधकार से प्रकाश तक का आध्यात्मिक अर्थ
यदि हम भाव और यथार्थ की मनोभूमि में पैठकर देखें तो अमावस्या और पूर्णिमा दोनों सूर्य की महिमा का प्रतिपादन ...और पढ़ें
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दीपावली का आध्यात्मिक रहस्य: अंधकार से प्रकाश की ओर एक गहन यात्रा
स्वामी मैथिलीशरण, संस्थापक-अध्यक्ष, रामकिंकर विचार मिशन। जगत प्रकास्य प्रकासक रामू। मायाधीस ग्यान गुन धामू॥
जासु सत्यता तें जड़ माया। भास सत्य इव मोह सहाया॥
असत् रूप संसार भी जिसके प्रभाव से सत् रूप ही भासता है। तमसो मा ज्योतिर्गमय की संपूर्ण व्याख्या है दीपावली। उपनिषद का यह सूत्र दीपावली को व्याख्यायित करता है। दीपावली की अंधेरी रात्रि में शरद पूर्णिमा का पूर्ण चंद्रमा धरती पर जलाए जाने वाले दीपकों में प्रकाश भरे आकाश को देखता है; मानो चंद्रमा सूर्य से कहता है कि हमारे जीवन में जब आप थे तो हम क्या थे और अब आप नहीं तो हम कुछ नहीं। भक्ति और भक्त की भावनाओं की परिपूर्णता है दीपावली। चंद्रमा माला जपता है, माला की तरह घूमता है। चंद्रमा कृष्णपक्ष में साधना के महत्व को दर्शाता है और शुक्ल पक्ष में कृपापक्ष का प्राकट्य करता है।
भगवान श्रीराम की कृपा से परिपूर्ण भगवान शंकर के मुख को भगवती पार्वती शारदीय चंद्रमा की उपमा देते हुए कहती हैं-
नाथ तवानन ससि स्रवत कथा सुधा रघुबीर।
श्रवन पुटन्हि मन पान करि नहिं अघात मतिधीर।।
हे शिव! आपका मुख वह चंद्रमा है, जिससे रामकथामृत का प्रवाह होता है, जिसको सुनकर मेरा मन कभी नहीं भरता है। भारतीय वांगमय अनंतता का प्रतिबिंब है। इसमें साहित्य, काव्य, त्योहारों के द्वारा भी आनंद तथा दिव्यता के प्रकाशन का प्रयास किया गया है। वर्ष के प्रारंभ में चैत्र नवरात्र का उपसंहार रामनवमी से होता है और वर्ष का अंत होलिका दाह और होली के रंगों से पूर्ण होता है। होली पर हम पूर्ण चंद्र के दर्शन करते हैं और दीपावली पर चंद्रमा का अभाव हो जाता है। यही है हमारी सनातन आस्था की सार्वभौमता और दिव्यता। हमारे यहां प्रत्येक परिस्थिति के त्योहार है; जिसमें प्रकृति के सभी स्वरूपों का स्वागत है।
पौराणिक कथाओं में चंद्रमा को भले ही कलंक लगा हो, पर सारे हिंदी और संस्कृत वांगमय में चंद्र को केंद्र में रखकर शीतलता और सौंदर्य को मापदंड के रूप में स्वीकार किया गया है। समुद्र मंथन में एक रत्न चंद्रमा भी है। दीपावली को संसार दीपक जलाकर चंद्रमा के प्रति अपना सम्मान प्रकट करता है। दीपावली की रात्रि को गणेश जी और लक्ष्मी जी का पूजन का तातपर्य है कि अंधकार में संभव है कि हम लक्ष्मी का अर्जन और उपयोग उचित मार्ग से न कर पाएं, किंतु यदि लक्ष्मी के साथ विवेक के देवता श्रीगणेश जी साथ रहेंगे तो जीवन में शुभ-लाभ होगा। विवेक-गणेश के अभाव में संभव है कि हमारी लक्ष्मी हमको कलंकित कर दे।
मंथन तो अंधकार में ही होता है, ज्ञान प्राप्त करने का सर्वश्रेष्ठ काल है अज्ञान की प्राकृतिक अवस्था। प्रकाश तो मंथन की उपलब्धि है। दीपावली की अमावस्या जीवन में आए बिना नहीं रहेगी, किंतु इसी दीपावली में जो साधक यह जानता है कि प्रकाश, अमृत, कामधेनु, सूर्य का सात मुखवाला घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभमणि, कल्पवृक्ष, रंभा के रूप में सौंदर्य, लक्ष्मी, अमृत कलश ये सब तो निकलेगा, पर ध्यान रहे कि जीवन में जब-जब समुद्र मंथन होगा तो विष सबसे पहले निकलेगा। जिसको कोई लेने को तैयार नहीं होगा। अमृत के बंटवारे में ही राहु-केतु बनते हैं। यह समाज का सत्य है कि जब-जब अमृत का बंटवारा होगा तो राक्षस सबसे अगली पंक्ति में बीचोबीच बैठ जाएंगे। भगवान का सहारा ही संसार का आधार है कि वे राहु का सिर काट देते हैं। फिर उसी राहु का सिर वाला भाग राहु बन गया और धड़ केतु बन गया। यह उसी काल का सत्य नहीं है, ज्योतिष के अनुसार यह आज भी लोगों की जन्म कुंडली में कुंडली मारकर बैठे हैं। व्यक्ति को समाज को इस दीपावली के प्रकाश में इन राहु-केतुओं को पहचानना होगा और तब हमें भगवान की कृपा का अमृत मिल सकेगा।
लक्ष्मी और कामधेनु के सदुपयोग के द्वारा जीवन में अमृतत्व तभी आएगा, जब राम नाम को हृदय में धारण करने वाले विश्वास रूप शिव हमारे जीवन में आ जाएं और नाम के प्रभाव से विष का पूरा घट पी लें। जो शिव द्वितीया के वक्र चंद्रमा को अपने सिर पर धारण करके उसे जगत पूज्य बना दें। चंद्रमा हर दिन पूज्य है। दीपावली प्रकाशक को प्रकाशित करने की वह आरती और साधना की रात्रि है, जो हमें प्रकाशक के साथ जोड़ देती है। शीतलता और मिठास चंद्रमा का गुण है। दीपावली की रात्रि से हवा में शीतलता प्रवेश करने लगती है। जीवन और स्वभाव में अंधकार से प्रकाश की ओर जाना, असत् से सत् की ओर और मृत से अमृत की ओर जाना ही हमारा परम लक्ष्य है।
मध्य प्रदेश और उत्तरप्रदेश की सीमाओं से जुड़े चित्रकूटधाम में प्रभु श्रीरामचंद्र, जनकनंदिनी श्रीसीता तथा अनुज श्रीलक्ष्मण ने संसार की दृष्टि से अपनी लीलाकाल का सबसे कष्टमय वनवास काल के लगभग साढ़े 11 वर्ष विन्ध्य पर्वत शृंखला में कामदगिरि के निकट बिताए। आज भी पूरे वर्ष का सबसे बड़ा त्योहार और साधना का चरम उत्कर्ष इसी दीपावली की रात्रि को माना जाता है, जब संपूर्ण विंध्यप्रदेश और कुछ आसपास क्षेत्रों के भक्तगण दीपावली की रात्रि को सीताराम सीताराम का कीर्तन करते हुए उस कामदगिरि की परिक्रमा करते हैं, जहां भगवान ने कष्ट को आनंद में बदल दिया। वे कदाचित उस काल में अयोध्या की घटनाओं को भूलकर मां मंदाकिनी, स्फटिकशिला तथा अनेक स्थलों पर निवास करने वाले लोगों में प्रेम का संचार करते हैं। जो हिंसक पशु थे, वे अहिंसक हो गये। जो लूटपाट को ही अपना व्यवसाय मानते थे, वे भगवानमय-राममय हो गए।
कोलभीलों ने प्रभु के भाई श्रीभरत के समक्ष अपने पूर्व जीवन और वर्तमान के अंतर का श्रेय श्रीराम को देकर भरत को प्रेम की मंदाकिनी में स्नान करा दिया। राम की प्रशंसा सुनकर जो प्रेममूर्ति हो जाए, वही तो भरत है। लूटपाट करने वाले भरत को फल लाकर दे रहे हैं और कह रहे हैं कि इनमें जो मिठास है, वह आपके भैया श्रीराम लक्ष्मण और माता सीता के इस वन में पधारने के बाद आई है। संसार के इतिहास में विचारों और संबंधों का ऐसा सम्मेलन कहीं नहीं हुआ, जैसा चित्रकूट में हुआ। जहां गुरु वशिष्ठ, विश्वामित्र जी, प्रभु की तीनों माताएं, जनक जी, सुनयना जी, अयोध्यावासियों के साथ चित्रकूट में बिल्कुल विपरीत परिस्थिति में मिले और रामराज्य बनाने का प्रमुख आधार (प्रभु चरणों की पादुकाएं) श्रीभरत को चित्रकूट में ही प्राप्त हुआ। दीपावली रामराज्य बनाती है। चाहे वह चित्रकूट हो चाहे अयोध्या। धर्म और धार्मिक स्थल की परिक्रमा के साथ तीर्थ स्नान करके राममय हो जाना ही दीपावली का वह प्रकाश है, जिसकी आवश्यकता जीव को हर काल में रहेगी।
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