केवल पूजा-उपवास नहीं, भीतर छिपी प्राण ऊर्जा को जगाने का पर्व है नवरात्र, पढ़ें देवी के विभिन्न रूपों का रहस्य
श्री श्री रवि शंकर बताते हैं कि नवरात्र केवल पूजा-उपवास नहीं, बल्कि भीतर छिपी प्राण ऊर्जा को जगाने का पर्व ...और पढ़ें

नवरात्र का गूढ़ रहस्य और प्राण ऊर्जा
श्री श्री रवि शंकर (आर्ट आफ लिविंग के प्रणेता आध्यात्मिक गुरु)। समस्त संसार में एक ही शक्ति और ऊर्जा व्याप्त है। संसार एक ही परम तत्व की अभिव्यक्ति है, किंतु वह स्वयं को विभिन्न रूपों, ऊर्जाओं और गुणों के माध्यम से अभिव्यक्त करता है। नवरात्र का प्रत्येक दिवस देवी दुर्गा की पूजा और आराधना को समर्पित है, किंतु दैवी ऊर्जा के प्रति समर्पण और भक्ति उनके विभिन्न रूपों जैसे नवदुर्गा की पूजा द्वारा अभिव्यक्त होती है।
नवरात्र को केवल पूजा, उपवास और उत्सव के रूप में देखना इसके व्यापक जीवन दर्शन को सीमित कर देता है। यह पर्व अपनी चेतना को पहचानने और भीतर छिपी शक्ति को जाग्रत करने का पर्व है। जिस तरह शिशु मां के गर्भ में नौ महीने तक विश्राम करता है और एक नई ऊर्जा और चेतना के साथ जन्म लेता है, उसी प्रकार यह पर्व भी हमें गहन विश्राम में जाकर पुनः एक नई ऊर्जा और चेतना को प्राप्त करने का अवसर देता है।
हमें दैवीय ऊर्जा को किसी बाहरी रूप या मूर्ति तक सीमित नहीं मानना चाहिए। देवी संसार के प्रत्येक रूप और अस्तित्व के प्रत्येक स्तर पर विद्यमान हैं। वास्तव में देवी के विभिन्न रूप हमारे भीतर छिपी ऊर्जा और नकारात्मकता के अंत की ओर संकेत करते हैं। जीवन शक्ति ही दिव्यता है और वह हमारे भीतर ही विद्यमान है। जब यह जाग्रत होती है तो नकारात्मकता का अंत स्वतः ही हो जाता है।
देवी दुर्गा की कथाएं अपने भीतर गूढ़ अर्थों को समाहित किए हुए हैं। शक्ति द्वारा नकारात्मकता के अंत का वर्णन कई कथाओं में मिलता है। ऐसी ही एक कथा रक्तबीजासुर के अंत की है। रक्तबीजासुर के रक्त की एक बूंद जब भूमि पर गिरती थी तो उस एक बूंद से पुनः एक नए रक्तबीजासुर का जन्म हो जाता था। हमारे डीएनए में हमारे सभी गुणों का सार समाहित है। अतः इसे मूल से बदलना ही संभव है। देवी इस मूल में छिपी नकारात्मकता को समाप्त करने के लिए त्रिशूल का प्रयोग करती हैं।
यहां त्रिशूल तीन बातों का प्रतीक है - ज्ञान, प्रेम और कर्म। ज्ञान, प्रेम और कर्म द्वारा गहराई में छिपी नकारात्मकता का अंत किया जा सकता है। केवल विचारों के स्तर पर होने वाला परिवर्तन बहुत सतही होता है, किंतु जब यही परिवर्तन अस्तित्व के तल पर होता है तो यह बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाता है। जब आप साधना करते हैं और आध्यात्मिक ऊर्जा को जाग्रत करते हैं तो यह आपके भीतर गहराई में छिपी नकारात्मकता का नाश करती है। यह आपके भीतर अस्तित्वगत परिवर्तन लाती है।
महिषासुर जड़ता और आलस्य का प्रतीक है। जब जीवन में जड़ता आ जाती है तो जीवन की प्रगति बाधित हो जाती है। जब महिषासुर रूपी आलस्य और जड़ता हमारे जीवन में जगह बना लेता है तो सृजनात्मक गुणों का नाश हो जाता है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश की सम्मिलित शक्ति से दुर्गा शक्ति का अवतरण हुआ और इस शक्ति ने महिषासुर का वध कर दिया। दुर्गा शक्ति कुंडलिनी शक्ति का भी प्रतीक है। जब कुंडलिनी शक्ति जागती है तो आलस्य और जड़ता का अंत हो जाता है।
इसी तरह एक अन्य असुर धूम्रलोचन है। धूम्रलोचन का अर्थ है धुंधली आंखें। वह जो पूरी तरह से दृष्टिहीन नहीं है, किंतु उसकी दृष्टि स्पष्ट भी नहीं है। धूम्रलोचन उस व्यक्ति या मानसिकता का प्रतीक है, जिसे लगता है कि वह सब कुछ जानता है, किंतु वास्तव में वह नहीं जानता। वह किसी भी बात पर स्पष्ट नहीं होता, उसके मन-मस्तिष्क में सब कुछ धुंधला और भ्रमपूर्ण होता है। वह अपनी बात सिद्ध करने के लिए कुतर्क का सहारा लेता है। जब मन गहन विश्राम में होता है तो दृष्टि स्पष्ट होने लगती है। नवरात्र का यह पर्व हमें अंतर्मुखी बनाकर हमारी दृष्टि को स्पष्ट करता है।
इसी तरह चंड-मुंड हमारे व्यर्थ के हठ और अकारण विद्रोह को दर्शाने वाली ऊर्जाएं हैं। चंड का अर्थ है- ऐसी ऊर्जा जो घटनाओं के नकारात्मक पक्ष को ग्रहण करती है। मुंड ऐसी ऊर्जा है, जिसके पास समझ ही नहीं है, जिसके पास कोई ग्रहणशीलता नहीं है। इस तरह के नकारात्मक व्यवहार और ऊर्जा हम सभी के जीवन में होती है। जब प्राण ऊर्जा का स्तर उच्च होता है तो मन के प्रत्येक विकार का समाधान हो जाता है।
