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पूजा के समय महिलाएं क्यों नहीं करतीं साष्टांग दंडवत प्रणाम? शास्त्रों में बताई गई है ये बड़ी वजह

Published: Wed, 07 Oct 2026 01:30 PM (GMT+05:30)

भारतीय संस्कृति में महिलाओं को अष्टांग दंडवत प्रणाम न करने की सलाह दी जाती है। यह इसलिए है क्योंकि इस ...और पढ़ें

महिलाएं साष्टांग प्रणाम क्यों नहीं कर सकतीं?

महिलाएं साष्टांग प्रणाम क्यों नहीं कर सकतीं?

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय संस्कृति में प्रणाम करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। हिंदू शास्त्रों में दंडवत प्रणाम का विशेष महत्व है। मान्यताओं के मुताबिक, एक दंडवत प्रणाम करने से एक यज्ञ के बराबर पुण्य फलों की प्राप्ति होती है।

हिंदू पूजा पद्धति में षोडशोपचार पूजन यानी 16 चीजों से ईश्वर की पूजा करने का विधान है, जिसमें दंडवत प्रणाम को सबसे आखिरी चरण माना गया है।

अष्टांग आसन क्या है?

धरा पूरी तरह लेटकर माथा टेकते हुए इसे साष्टांग दंडवत प्रणाम कहा जाता है। यह एक बेहद ही सरल आसन है जिसमें शरीर का प्रत्येक भाग जमीन के साथ स्पर्श करता है, यह आसन इस बात का प्रतीक है कि, व्यक्ति अपना अहंकार छोड़ चुका है। इस तरह का आसन सामान्य तौर पर पुरुषों द्वारा ही किया जाता है।

हिंदू शास्त्रों में स्त्रियों को यह आसन करने की पूरी तरह से मनाही है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस आसन को करते हुए महिलाओं का गर्भ और सीना जमीन को स्पर्श कर सकता है। हिंदू शास्त्रों में गर्भ एक जीवन को धारण रखता और वक्ष वाला हिस्सा उस जीवन को पोषण देने का काम करता है। इसलिए यह आसन स्त्रियों को करने से मना किया जाता है।

स्त्रियों को क्यों साष्टांग प्रणाम करने की मनाही है?

सनातन परंपरा में साष्टांग प्रणाम के संदर्भ में एक श्लोक का वर्णन किया गया है।

"पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यमुर्सा शिरस्तथा।
मनसा वाचसा दृष्ट्या प्रणामोऽष्टाङ्ग उच्यते॥"

अर्थात्- हाथ, पैर, घुटने, छाती, मस्तक, मन, वचन और आंखें इन 8 अंगों से किया हुआ प्रणाम ही अष्टांग नमस्कार होता है। साष्टांग आसन में शरीर के 8 अंग जमीन से स्पर्श करते हैं, जिस वजह से इसे 'साष्टांग प्रणाम' कहा जाता है। इस आसन में जमीन का स्पर्श करने वाली ठोढ़ी, छाती, दोनों हाथ, दोनों घुटने और पैर शामिल हैं।

धर्मसिंधु ग्रंथ से जुड़े श्लोक में कहा गया है कि,

“ब्राह्मणस्य गुदं शंखं शालिग्रामं च पुस्तकम्. वसुन्धरा न सहते कामिनी कुच मर्दनं.”

अर्थात्- ब्राह्मण का पिछला हिस्सा, शंख, शालिग्राम और धार्मिक पुस्तकें कभी भी सीधे तौर पर धरती से स्पर्श नहीं कराना चाहिए। इसके अलावा महिलाओं को भी जमीन पर अपने पेट और वक्षस्थल के साथ दंडवत प्रणाम करने से बचना चाहिए।

हिंदू धर्म में महिलाएं देवी का रूप

हिंदू धर्म में औरतों को जननी के रूप में पूजा जाता है, क्योंकि महिलाएं अपने पेट में एक जीवन को पालने के साथ वक्षस्थल से उसे पोषण प्रदान करती हैं। इसलिए महिलाओं को अपने ये दोनों अंगों को भूमि से स्पर्श नहीं करना चाहिए।

हिंदू मान्यताओं के मुताबिक, जो भी महिलाएं ऐसा करती हैं, मां लक्ष्मी उनसे नाराज हो सकती हैं। शास्त्रों के हिसाब से महिलाओं के लिए प्रणाम करने का सबसे बेहतर तरीका किसी आसन पर अपने घुटनों पर बैठकर मंदिर में प्रणाम करना है, इससे पूजा का सही फल प्राप्त होता है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।