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कुशा की अंगूठी पहनकर ही क्यों किए जाते हैं धार्मिक कर्म? दाहिने हाथ से जुड़ा है खास नियम

Published: Mon, 17 Aug 2026 05:09 PM (IST)

पूजा या हवन के दौरान दाहिने हाथ में कुशा की अंगूठी यानी 'पवित्री' क्यों पहनी जाती है? इसके पीछे छिपे धार्मिक, ज्योतिषीय कारण क्या है।

दाहिने हाथ में कुशा की अंगूठी पहनने का महत्व

दाहिने हाथ में कुशा की अंगूठी पहनने का महत्व

HighLights

  1. कुशा की उत्पत्ति भगवान विष्णु के रोम से हुई

  2. दाहिने हाथ की अनामिका उंगली सूर्य से जुड़ी है

  3. यह ऊर्जा बचाकर नकारात्मकता से करती रक्षा है

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। आपने अक्सर देखा होगा कि जब भी घर में कोई पूजा या कथा होती है, चाहे वो सत्यनारायण भगवान की कथा हो, हवन, रुद्राभिषेक या फिर पितरों का तर्पण हो, तो पूजा शुरू होने से ठीक पहले पंडित जी हमारे दाहिने हाथ की उंगली में घास से बनी एक अंगूठी पहनाते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि सोने, चांदी या हीरे की अंगूठी को छोड़कर इस साधारण सी दिखने वाली घास की अंगूठी को हमारे शास्त्रों में इतना महत्व क्यों दिया गया है?

दरअसल, यह कोई आम घास नहीं है, इसे 'कुशा' कहते हैं और इससे बनी अंगूठी को 'पवित्री' कहा जाता है। आइए इस आर्टिकल में समझते हैं कि इसके पीछे का असली विज्ञान और धर्म क्या कहता है।

भगवान विष्णु के रोम से हुई उत्पत्ति

एस्ट्रोपत्री के ज्योतिषियों और हमारे प्राचीन ग्रंथों की मानें तो कुशा को धरती की सबसे पवित्र वनस्पतियों में से एक माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कुशा की उत्पत्ति भगवान विष्णु के शरीर के रोम (बालों) से हुई है। स्कंद पुराण में कुशा की महिमा का बखान करते हुए एक बहुत ही सुंदर श्लोक लिखा गया है:

"कुशमूले स्थितो ब्रह्मा कुशमध्ये तु केशवः।"

स्कंद पुराण के इस श्लोक का अर्थ है कि कुशा की जड़ में सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी का वास होता है। और, इसके मध्य भाग में भगवान विष्णु विराजमान हैं। यही वजह है कि इसे उंगली में धारण करने से व्यक्ति भीतर से पवित्र हो जाता है और उसे ईश्वर का सीधा आशीर्वाद मिलता है।

दाहिने हाथ की अनामिका उंगली ही क्यों?

अब एक बड़ा सवाल यह उठता है कि इसे दाहिने हाथ की अनामिका उंगली में ही क्यों पहना जाता है? ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, हमारे हाथ की अनामिका उंगली का सीधा संबंध 'सूर्य' ग्रह से होता है। सूर्य को ऊर्जा, आत्मा, तेज और सफलता का कारक माना गया है। जब हम इस उंगली में कुशा की अंगूठी पहनते हैं, तो सूर्य ग्रह मजबूत होता है। इससे हमारी आत्मा शुद्ध होती है और ईश्वर के साथ हमारा आध्यात्मिक जुड़ाव बेहतर होता है।

शरीर की ऊर्जा को बचाती है पवित्री

इसके पीछे सिर्फ धर्म ही नहीं, बल्कि एक बहुत ही सटीक विज्ञान भी छिपा हुआ है। जब हम पूरे ध्यान से पूजा पर बैठते हैं और मंत्रों का उच्चारण करते हैं, तो हमारे शरीर के भीतर एक विशेष प्रकार की आध्यात्मिक ऊर्जा (Spiritual Energy) पैदा होती है।

विज्ञान कहता है कि कुशा घास एक बेहतरीन कुचालक (Insulator) का काम करती है। धरती में गुरुत्वाकर्षण होता है जो हर चीज को अपनी ओर खींचता है। यह कुशा की अंगूठी शरीर में पैदा होने वाली उस सकारात्मक ऊर्जा को उंगलियों के रास्ते जमीन में जाने से रोकती है। इसका मतलब है कि आपकी ऊर्जा आपके शरीर में ही सुरक्षित (Conserve) रहती है, जिससे पूजा का पूरा फल आपको मिलता है और आपको थकान महसूस नहीं होती।

नकारात्मक शक्तियों से बचाव

पूजा के समय हमारे आस-पास कई तरह की बाहरी और नकारात्मक ऊर्जा भी हो सकती हैं, जो हमारा ध्यान भटकाने या पूजा में बाधा डालने की कोशिश करती हैं। कुशा की यह पवित्री एक सुरक्षा कवच या ढाल की तरह काम करती है। यह इन नकारात्मक तरंगों को हमारे शरीर और मन पर हावी नहीं होने देती।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।