दीवाली पर क्यों उतारी जाती है बच्चों की अलाया बलैया? जानें उत्तर प्रदेश की इस खास परंपरा का महत्व और शुभ समय
दीवाली पर उत्तर प्रदेश में बच्चों की अलाया बलैया उतारने की अनोखी परंपरा है। इसमें नजर उतारकर बुरी बलाओं को ...और पढ़ें

दीवाली पर उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र में 'अलाया बलैया' की अनोखी लोक परंपरा निभाई जाती है। (Picture Credit- AI Generated)

समय कम है?
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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। दीवाली का त्योहार केवल दीप जलाने और माता लक्ष्मी की पूजा करने तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र और ग्रामीण इलाकों में इस पर्व पर एक अनोखी लोक परंपरा भी निभाई जाती है, जिसे 'अलाया बलैया' या 'अलाई बलाई' उतारना कहा जाता है। इस रस्म में बच्चों की नजर उतारी जाती है और एक जलती हुई मशाल के जरिए घर से बुरी बलाओं को दूर करने की परंपरा निभाई जाती है।
मान्यता है कि इससे परिवार में सुख-शांति आती है और बच्चों पर किसी तरह की बुरी नजर का प्रभाव नहीं रहता। वैसे इस परंपरा को अलग-अलग घरों में अलग-अलग तरीके से निभाया जाता है। कहीं पर यह रस्म पुरानी झाड़ू को जलाकर की जाती है, तो कहीं पर जूते चप्पल, वहीं कहीं-कहीं पर पानी से भी अलाया बलैया उतारी जाती है।
श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, द्वापर युग में जब पूतना का वध करने के बाद माता यशोदा ने भगवान कृष्ण की नजर उतारी थी, महापुराण के दशम स्कंध के छठे अध्याय के श्लोक 24 से 29 में बाल-रक्षा के लिए विशेष मंत्रों और झाड़े का उल्लेख मिलता है। इन मंत्रों का प्रयोग बच्चों या अपनों की नजर उतारने के लिए शुभ मानते हैं। वहीं क्षेत्र और लोक परंपराओं के अनुसार इस रस्म को लोग आपनी-अपनी तरह से करते हैं। दीवाली की रात अमावस्या की रात होती है, इसलिए इस रस्म को निभाने के लिए इसे उपयुक्त माना जाता है।
क्या होती है 'अलाया बलैया' की रस्म?
'अलाया बलैया' उत्तर प्रदेश की एक पुरानी लोक परंपरा है। इसे खासतौर पर दीवाली की शाम को निभाया जाता है। इसे परिवार की सुख-समृद्धि और बच्चों की सलामती से जोड़कर देखा जाता है। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी कई घरों में इसे पूरे उत्साह के साथ निभाया जाता हैं।
कैसे तैयार की जाती है अलाई बलाई?
पुराने समय में सूखी घास, सरकंडे, पतवार और सूखी झाड़ियों को बांधकर एक लंबी मशाल जैसी बनाई जाती थी। इसे ही अलाई बलाई कहा जाता है। आज भी कुछ जगहों पर इस तरह नजरदोष उतारने की प्रक्रिया होती है। वहीं कुछ घरों में लोटे में पानी भरकर रात में 10 बजे के बाद बच्चों के सिर से 7 बार घुमाकर चौराहे पर फेंक दिया जाता है। इतना ही नहीं, पुरानी झाड़ू और जूते चप्पल को भी इसी तरह से सिर के ऊपर घुमाकर चौराहे पर फेंक दिया जाता है और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा जाता है।
दीवाली की शाम लक्ष्मी-गणेश पूजन के बाद परिवार की बुजुर्ग महिलाएं इस रस्म की शुरुआत करती हैं। परंपरा के अनुसार, बच्चों के सिर के ऊपर से अलाई बलाई सात बार घुमाई जाती है। इसे बच्चों की बुरी नजर और परेशानियां दूर हो जाती हैं।
क्या बोला जाता है अलाई बलाई उतारते समय?
इस रस्म के दौरान अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग लोकवाक्य बोले जाते हैं। कहीं कहा जाता है, ‘अलाय जाए, बलाय जाए, लक्ष्मी का वास हो’, तो कहीं बिल्कुल शांत रहकर यह प्रक्रिया निभाई जाती है।
घर से बाहर क्यों ले जाते हैं जलती अलाई बलाई?
बच्चों की नजर उतारने के बाद अलाई बलाई को घर की सीमा से बाहर ले जाया जाता है। कुछ इलाकों में लोग इसे लेकर घर के बाहर या गांव के किसी निर्धारित स्थान तक जाते हैं। ऐसा करने से घर से नकारात्मकता और दरिद्रता को बाहर किया जाता है।
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