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बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में आखिर दीवाली पर क्यों बनाया जाता है घरौंदा? जानिए इस खास परंपरा का रहस्य 

Published: Wed, 28 Oct 2026 10:00 AM (IST)

बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में दीवाली पर घरौंदा बनाने की परंपरा का महत्व बताया गया है। यह भगवान राम ...और पढ़ें

घरौंदा का धार्मिक महत्व (Picture Credit: AI Generated)

घरौंदा का धार्मिक महत्व (Picture Credit: AI Generated)

HighLights

  1. भगवान राम के वनवास से लौटने पर घरौंदा बनाया गया।

  2. मां लक्ष्मी-गणेश के स्वागत हेतु घरौंदे में स्थापना।

  3. बालिकाओं को गृहस्थ जीवन की शिक्षा देता है यह।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में दीवाली के पर्व का बहुत महत्व है। देशभर में इस पर्व के दिन कई खास परंपराओं को निभाया जाता है। इन्हीं परंपराओं में शामिल है दीवाली पर घरौंदा बनाने की परंपरा। दीवाली के दिन बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) में मिट्टी, लकड़ी और रंगों से सजे छोटे-छोटे 'घरौंदे' लोक संस्कृति की एक अत्यंत पावन और अनूठी पहचान हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में दीवाली के दिन आखिर मिट्टी से घरौंदा बनाने की वजह क्या है? अगर नहीं पता, तो ऐसे में आइए इस आर्टिकल में आपको विस्तार से बताते हैं इसके पीछे की वजह के बारे में।

क्यों बनाया जाता है घरौंदा?

धार्मिक मान्यता के अनुसार, जब भगवान श्रीराम 14 वर्षों के वनवास के बाद अयोध्या आए थे, तो नगरवासियों ने प्रभु के स्वागत के लिए मिट्टी से घरौंदे बनाकर उत्सव मनाया था। ऐसा माना जाता है कि दीपावली की रात को मां लक्ष्मी और भगवान गणेश का ध्यान कर उन्हें घरौंदे में स्थापित करने से सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है।

मिट्टी से बने घरौंदे को सजाया जाता है। इसमें छोटे-छोटे बर्तन रखने का विधान है। बर्तन में अनाज, खील, बताशे, मिठाई आदि चीजों को रखा जाता है। दीवाली की रात घरौंदा बनाने की परंपरा से इस बात का संदेश मिलता है कि परिवार ने देवी-देवताओं के ठहरने के लिए एक प्रेमपूर्ण घर तैयार किया है। मान्यता है कि घरौंदा बनाने से घर में दरिद्रता दूर होती है और सकारात्मक ऊर्जा का आगमन होता है।

यह परंपरा मुख्य रूप से घर की अविवाहित कन्याओं द्वारा निभाई जाती है। यह बालिकाओं को अपने घर को प्रेम, व्यवस्था और समर्पण से संवारने की भावना सिखाती है, जो उनके भावी गृहस्थ जीवन की एक मजबूत नींव बनती है।

घरौंदा बनाते समय परिवार की महिलाएं और बच्चे एक साथ मिलकर मिट्टी, लकड़ी, रंग और अन्य सजावटी सामग्री का उपयोग करते हैं। यह न केवल बच्चों में रचनात्मकता का विकास करता है, बल्कि परिवार के सदस्यों के बीच आपसी प्रेम और सौहार्द भी बढ़ाता है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।