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नवजात को पहली बार कब ले जाएं मंदिर? जानें निष्क्रमण संस्कार का सही समय और धार्मिक महत्व

Published: Wed, 23 Sep 2026 05:12 PM (IST)

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवजात शिशु को मंदिर जन्माशौच की अवधि समाप्त होने के बाद और निष्क्रमण संस्कार के तहत 11वें/12वें दिन या 40 दिन बाद ही ले जाना चाहिए।

हिंदू परंपराओं में बच्चे का पहली बार बाहर जाना (Picture Credits- AI Images)

हिंदू परंपराओं में बच्चे का पहली बार बाहर जाना (Picture Credits- AI Images)

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समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। बच्चे के जन्म के बाद मां को तकरीबन 40 दिनों तक आराम करने की सलाह दी जाती है और इस दौरान अधिकतर महिलाएं यही सोचती हैं कि आखिर उन्हें अपने बच्चे के साथ कब बाहर जाने का मौका मिलेगा? शिशु को बाहर ले जाने को लेकर मां-पिता के मन में कई तरह के सवाल उठते हैं।

अधिकतर लोगों को मालूम नहीं होता है कि, बच्चे को बाहर ले जाने का सही समय क्या है और उसे कब और कहां ले जाना चाहिए। इन्हीं सब सवाल का जवाब दिया है एस्ट्रोपत्री के ज्योतिषी चंद्रेश शर्मा ने।

एस्ट्रोपत्री के ज्योतिष चंद्रेश शर्मा के अनुसार, धार्मिक परंपराओं और शास्त्रों के मान्यताओं के अनुसार, नवजात शिशु को जन्माशौच की अवधि समाप्त होने के बाद ही मंदिर ले जाना चाहिए।

धार्मिक परंपराएं और निष्क्रमण संस्कार का महत्व

शुद्धि पूजा और समय

सामान्यतः जन्म के 11वें या 12वें दिन नामकरण संस्कार और शुद्धि पूजा के पश्चात शिशु को मंदिर ले जाने की अनुमति होती है। कई क्षेत्रीय परंपराओं में 40 दिन के बाद बच्चे को बाहर निकालने का नियम है।

निष्क्रमण संस्कार

शास्त्रों में 'निष्क्रमण संस्कार' का उल्लेख मिलता है, जिसके तहत सूर्य दर्शन और देव दर्शन कराए जाते हैं। हिंदू धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक के 16 संस्कारों को निभाया जाता है, जिसमें निष्क्रमण संस्कार छठें नंबर पर आता है। नामकरण के बाद ही निष्क्रमण संस्कार किया जाता है।

मंगल कामना

पूजन के समय भगवान से प्रार्थना की जाती है कि बालक मन से शांत, इंद्रियों पर संयम रखने वाला, निर्भय और सभी जीवों का प्रिय बनता हुआ कल्याणपूर्वक गृह-सीमा से बाहर कदम रखे।

ऊर्जा का प्रभाव

नवजात का शरीर और मन ऊर्जा के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होता है। सूतक काल के बाद उसे मंदिर ले जाने से सात्विक वातावरण, वैदिक मंत्रोच्चार और देव प्रतिमाओं की ऊर्जा शिशु को सुरक्षा, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु प्रदान करती है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।