भगवान विष्णु के पैरों से कैसे प्रकट हुईं पतित पावनी गंगा? क्या है नदी के 'विष्णुपदी' कहलाने का सच?
मां गंगा को 'विष्णुपदी' भी कहा जाता है, जिसके पीछे वामन अवतार से जुड़ी एक पौराणिक कथा छिपी हुई है। चलिए जानते हैं इस बारे में।

गंगा का भगवान विष्णु के चरणों से उद्भव (Picture Credit- AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत के अनुसार, सनातन धर्म में पतित-पावनी मां गंगा को केवल भगवान शिव की जटाओं से जुड़ी देवी ही नहीं, बल्कि सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु के चरणों से उत्पन्न माना गया है। यही कारण है कि देव नदी गंगा का एक नाम 'विष्णुपदी' भी है। चलिए पढ़ते हैं यह अद्भुत कथा।
क्या है पौराणिक कथा
एस्ट्रोपत्री के ज्योतिषी चंद्रेश शर्मा के अनुसार, पौराणिक कथाओं में गंगा नदी को 'विष्णुपदी' कहे जाने के पीछे एक अत्यंत पवित्र प्रसंग छिपा है। जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर तीन पगों में पूरे ब्रह्मांड को नापा था, तब उनके बाएं पैर के अंगूठे के नख (नाखून) से ब्रह्मांड का ऊपरी आवरण फट गया था। उस स्थान से जो पवित्र जलधारा प्रकट हुई, उसने सीधे श्री हरि के चरणों को धोया और वहां से प्रवाहित हुईं। इसके बाद इस धारा को ब्रह्मा जी ने अपने कमडंल में धारण कर लिया। आगे चलकर इसी जलधारा का पृथ्वी पर गंगा के रूप में आगमन हुआ।
श्री हरि भगवान विष्णु के चरणों से निकलकर और देवों के देव महादेव की जटाओं में समाने वाली गंगा केवल एक नदी नहीं हैं, बल्कि वे साक्षात् मोक्षदायिनी 'विष्णुपदी' हैं। ऐसी मान्यता है कि इस पवित्र जल का केवल स्पर्श मात्र करने से ही जीवात्मा को सभी पापों से मुक्त कर पूरी तरह पवित्र कर देता है। यही कारण है कि सनातन संस्कृति में गंगा जल को परम पूजनीय और मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया है।

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मां गंगा के अन्य प्रचलित नाम और कथा
- भागीरथी - राजा भगीरथ के कठोर तप के कारण ही गंगा का पृथ्वी आगमन संभव हुआ था, जिस कारण गंगा का एक नाम भागीरथी भी है।
- त्रिपथगा - इस नाम का अर्थ है तीनों लोकों यानी स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल लोक में प्रवाहित होने वाली। वहीं देवलोक में प्रवाहित होने के कारण गंगा को 'देवनदी' भी कहा जाता है।
- पतित पावनी गंगा - हिंदू धर्म में गंगा को पतित-पावनी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसके जल में स्नान करने से मनुष्य के सभी ज्ञात-अज्ञात पाप धुल जाते हैं और उसे मोक्ष मिलता है, यानी वह व्यक्ति जीवन-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।
- जाह्नवी - जब राजा भगीरथ, मां गंगा को पृथ्वी पर ला रहे थे, तब गंगा के तीव्र वेग और शोर के कारण महर्षि जह्नु की तपस्या में बाधा उत्पन्न हुई। जिससे क्रोधित होकर ऋषि ने पूरी गंगा नदी का जल पी लिया। इसके बाद राजा भगीरथ और देवताओं ने ऋषि जह्नु से प्रार्थना की, तब उन्होंने गंगा को अपने कान से बाहर निकाला। ऋषि जह्नु के शरीर (कान) से बाहर निकलने के कारण ही मां गंगा को 'जाह्नवी' नाम मिला।
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