पाप मुक्ति से जुड़ा है 'परिक्रमा' का यह श्लोक, मंदिर में भगवान के चक्कर लगाना क्यों माना जाता है जरूरी?
हिंदू धर्म में मंदिर दर्शन के बाद परिक्रमा का विशेष महत्व है। जानिए प्रदक्षिणा क्यों हमेशा सीधे हाथ की तरफ से की जाती है और इसके क्या आध्यात्मिक लाभ हैं।

परिक्रमा करने के नियम (AI-Generated Image)

समय कम है?
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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। क्या आपने कभी सोचा है कि मंदिर में दर्शन करने के बाद हम भगवान की मूर्ति या गर्भगृह के गोल-गोल चक्कर क्यों लगाते हैं? हिंदू धर्म में इसे 'परिक्रमा' या 'प्रदक्षिणा' कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि भगवान की परिक्रमा किए बिना हमारी पूजा पूरी नहीं होती। यह केवल मंदिरों तक सीमित नहीं है, बल्कि भक्त पवित्र अग्नि, तुलसी माता, पीपल के पेड़ और तीर्थ स्थानों की भी पूरी श्रद्धा से परिक्रमा करते हैं।
प्रदक्षिणा का असली मतलब क्या है?
'प्रदक्षिणा' शब्द का सीधा सा मतलब है 'दाईं ओर'। इसलिए, परिक्रमा हमेशा ऐसे की जाती है कि भगवान हमेशा हमारे दाईं तरफ रहें। इसका मतलब है कि परिक्रमा करते समय हमें बाईं ओर से चलना शुरू करना चाहिए।
अगर हम 'प्र-द-क्षि-णा' शब्द को गहराई से समझें, तो इसका हर एक अक्षर बेहद चमत्कारी है। 'प्र' हमारे पापों को नष्ट करता है, 'द' हमारी मनोकामनाओं को पूरा करता है, 'क्षि' पुराने कर्मों के बंधन को काटता है और 'णा' हमें मोक्ष की ओर ले जाता है। इसे हमेशा शांत और ध्यानमग्न होकर करना चाहिए।
स्कंद पुराण के एक श्लोक के अनुसार-
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।
तानि तानि विनश्यन्ति प्रदक्षिण पदे-पदे॥
अर्थ- मेरे द्वारा इस जन्म में, जाने-अनजाने में या पिछले जन्मों में भी जो पाप हुए हैं, वो इस प्रदक्षिणा यानी परिक्रमा के हर एक कदम के साथ नष्ट हो जाए।
परिक्रमा हमेशा सीधे हाथ की तरफ से ही क्यों?
परिक्रमा हमेशा घड़ी की सुई की दिशा में ही की जाती है। इसके पीछे एक बहुत ही गहरा आध्यात्मिक कारण है। मान्यता है कि ईश्वर इस पूरे ब्रह्मांड के केंद्र में मौजूद हैं। जिस तरह सौरमंडल में सूर्य बीच में होता है और सारे ग्रह उसके चारों ओर घूमते हैं, ठीक वैसे ही हम भगवान को अपनी जिंदगी का केंद्र मानकर उनके चक्कर लगाते हैं।
पापों से मुक्ति और परिक्रमा के खास नियम
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, परिक्रमा का हर एक चक्कर हमारे पापों को धो देता है। हर भगवान के लिए परिक्रमा की संख्या भी अलग-अलग तय की गई है। भगवान गणेश जी की एक, सूर्य देव की दो, भगवान शिव की तीन और देवी मां व भगवान विष्णु जी की चार परिक्रमा की जाती हैं। अगर हम पूरे दिन में 21 बार परिक्रमा करते हैं, तो इसे सबसे ज्यादा लाभकारी माना गया है।
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