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पितृ पक्ष 2026: क्या महिलाओं और बहुओं को है पिंडदान का अधिकार? गया के सीता कुंड से जुड़ी है ये अद्भुत कथा

Published: Wed, 23 Sep 2026 06:02 PM (IST)

पितृ पक्ष 2026 की शुरुआत 26 सितंबर से हो रही है। हिंदू धर्म में क्या बेटा न होने पर बहुएं ...और पढ़ें

क्या श्राद्ध बहुएं कर सकती हैं? (AI-Generated image)

क्या श्राद्ध बहुएं कर सकती हैं? (AI-Generated image)

HighLights

  1. पितृ पक्ष 26 सितंबर से 10 अक्टूबर 2026 तक चलेगा

  2. पुत्र न होने पर बहुएं भी पिंडदान कर सकती हैं

  3. माता सीता ने गया में रेत से राजा दशरथ का पिंडदान किया था

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का बहुत ज्यादा महत्व है। यह वह समय होता है जब हम अपने पूर्वजों को याद करते हैं और उनके प्रति अपना सम्मान जताते हैं। पंचांग के अनुसार, इस साल 2026 में पितृ पक्ष की शुरुआत 26 सितंबर, शनिवार (भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा श्राद्ध) से हो रही है।

इसके अगले दिन यानी 27 सितंबर से आश्विन कृष्ण प्रतिपदा का श्राद्ध शुरू होगा। 15 दिनों तक चलने वाले इस पितृ पक्ष का समापन 10 अक्टूबर, शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के दिन होगा।

श्राद्ध के दिनों में लोग अपनी क्षमता के अनुसार तर्पण, ब्राह्मण भोज और दान-पुण्य का कार्य करते हैं। लेकिन, हमारे अक्सर एक सवाल बार-बार उठता है कि अगर किसी परिवार में बेटा न हो, तो पूर्वजों का श्राद्ध या पिंडदान कौन करेगा? क्या घर की बहुएं यह जिम्मेदारी उठा सकती हैं? शास्त्रों और हमारी पौराणिक कथाओं में इसका बहुत स्पष्ट जवाब मौजूद है।

जब माता सीता ने रेत से बनाए पिंड

जब भी महिलाओं या बेटियों के पिंडदान की बात आती है, तो बिहार के गया में माता सीता द्वारा किए गए पिंडदान का जिक्र जरूर होता है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक, भगवान राम, लक्ष्मण और माता सीता राजा दशरथ का श्राद्ध कर्म करने के लिए गया पहुंचे थे। राम और लक्ष्मण जब श्राद्ध की सामग्री जुटाने गए, तभी राजा दशरथ ने सीता जी के सामने पिंड की इच्छा जता दी। समय बीत रहा था और कोई सामग्री उपलब्ध नहीं थी।

ऐसे में माता सीता ने फल्गु नदी की रेत से ही पिंड बनाए और अपने ससुर को अर्पित कर दिए। गया का पवित्र 'सीता कुंड' आज भी इस बात का गवाह है कि एक महिला भी पिंडदान कर सकती है। वायु पुराण के 'गया महात्म्य'अध्याय में इस कथा के बारे में विस्तार से बताया गया है।

क्या है श्राद्ध का असली मतलब?

यहां श्राद्ध और पिंडदान का फर्क समझना भी जरूरी है। श्राद्ध का मतलब है श्रद्धा से पितरों को याद करना, जिसमें तर्पण और दान शामिल है। वहीं, पिंडदान में पितरों को 'पिंड' का भोग लगाया जाता है।

शास्त्रों के अनुसार, वैसे तो बेटे को ही श्राद्ध का मुख्य अधिकारी माना गया है। लेकिन, अगर पुत्र न हो, तो बेटियां, पत्नी या घर की बहू भी पूरे हक के साथ श्राद्ध कर्म कर सकती हैं। आजकल कई परिवारों में विवाहित बेटियां भी ये कर्मकांड पूरी आस्था और परंपरा के साथ निभाती नजर आती हैं।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।