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पितृ पक्ष 2026: देश का एकमात्र धाम, जहां पिंडदान करते ही पूर्वजों को मिल जाता है हमेशा के लिए मोक्ष!

Published: Fri, 02 Oct 2026 07:00 AM (IST)

बदरीनाथ स्थित ब्रह्मकपाल पितृ पक्ष में पिंडदान के लिए एक महत्वपूर्ण स्थल है, जहां किए गए श्राद्ध कर्म को अंतिम माना जाता है और इससे पितरों को मोक्ष मिलता है।

ब्रह्मकपाल में पूर्वजों के लिए मोक्ष

ब्रह्मकपाल में पूर्वजों के लिए मोक्ष

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। पितृ पक्ष 2026 की शुरुआत हो चुकी है और हिंदू धर्म में पितरों की आत्मा की शांति और उन्हें तृप्त करने के लिए पिंडदान और श्राद्ध की परंपरा रही है। हर वर्ष आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से श्राद्ध कर्म की शुरुआत हो जाती है, जो सर्वपितृ अमावस्या को समाप्त होती है।

पितृपक्ष के दौरान पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान किया जाता है। ऐसे में भारत देश में कई ऐसे भी तीर्थ हैं, जहां पितरों के लिए श्राद्ध कर्म की परंपरा निभाई जाती है। लेकिन उत्तराखंड के बदरीनाथ धाम में स्थित है ब्रह्मकपाल स्थान जो पिंडदान के दूसरे स्थानों से बिल्कुल अलग है।

ब्रह्मकपाल में किया गया पिंडदान अंतिम 

माना जाता है कि, ब्रह्मकपाल में किया जाने वाला पिंडदान अंतिम माना जाता है। यहां पिंडदान करने के बाद उसी पूर्वज के लिए दोबारा पिंडदान करने की आवश्यकता नहीं होती है। ब्रह्मकपाल बदरीनाथ मंदिर के पास अलकनंदा नदी के किनारे पर स्थित है पवित्र स्थल, जहां श्रद्धालु अपने दिवंगत परिजनों और पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध और पिंडदान करते हैं। माना जाता है कि, यहां श्राद्ध कर्म करने से दिवंगत आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

ब्रह्मकपाल से जुड़ी पौराणिक कथा

ब्रह्मकपाल से जुड़ी एक पौराणिक कथा भी है, जिसका संबंध भगवान शिव और ब्रह्माजी से जुड़ी है। माना जाता है कि सृष्टि की रचना के समय भगवान ब्रह्म के 5 मुख थे।

एक समय में ब्रह्मा जी के मन में काफी अहंकार उत्पन्न हो गया और उन्होंने खुद को श्रेष्ठ मानना शुरू कर दिया। माना जाता है कि ब्रह्मा के इसी अहंकार को खत्म करने के लिए भगवान शिव ने उनका पांचवां मुख काट दिया।

ब्रह्मकपाल स्थान नाम कैसे पड़ा?

ब्रह्मा जी का सिर काटने के बाद भगवान शिव पर ब्रह्महत्या का पाप लग गया। ब्रह्मा का कटा हुए सिर उनके हाथ से चिपक गया और काफी मेहनत के बाद भी अलग नहीं हो पाया। ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव भिक्षाटन करते हुए अलग-अलग स्थानों पर पहुंचे।

जब भगवान शिव बदरी इलाके पहुंचे तो ब्रह्मा जी का कपाल उनके हाथ से अलग होकर नीचे गिर गया। आगे चलकर इस स्थान का नाम ब्रह्मकपाल पड़ा।

ब्रह्मकपाल का महाभारत काल से भी संबंध

हिंदू धर्म में ब्रह्मकपाल का संबंध महाभारत काल में पांडवों से भी जोड़कर देखा जाता है। माना जाता है कि, महाभारत युद्ध में अपने ही सगे-संबंधियों के मारे जाने के बाद पांडवों का अंतर्मन पाप और दोष से भर गया था।

उन्होंने अपने मृत परिजनों और युद्ध में मारे गए योद्धाओं की आत्मा की शांति के लिए कई तरह के धार्मिक कर्म किए।

जन्म-मृत्यु चक्र से मिलती है मुक्ति

माना जाता है कि, ब्रह्मकपाल में विधि पूर्वक श्राद्ध और पिंडदान करने से पितरों की आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी विश्वास के कारण यह माना जाने लगा कि ब्रह्मकपाल में पितरों का पिंडदान करने से उनके लिए फिर कहीं भी पिंडदान करने की जरूरत नहीं है।

यही कारण है कि, इसे पिंडदान का अंतिम या पूर्ण कर्म कहा जाता है। पितृ पक्ष के दौरान ब्रह्मकपाल में पिंडदान करने के लिए श्राद्धलुओं की भारी भीड़ पहुंचती है। देशभर से लोग अपने पूर्वजों की याद में उनकी आत्मा की शांति के लिए धार्मिक अनुष्ठान करने के लिए आते हैं।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।