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उत्तराखंड के इस जिले से भगवान परशुराम का नाता, शांत हुआ था क्रोध; जानें सौम्यकाशी का रहस्य

Published: Sun, 19 Apr 2026 11:26 AM (IST)

इस जिले को भगवान परशुराम की तपस्थली माना जाता है। माता-पिता के अपमान पर क्षत्रियों का 21 बार संहार करने ...और पढ़ें

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जागरण संवाददाता, उत्तरकाशी। उत्तरकाशी जनपद को भगवान परशुराम की तपस्थली कहा जाता है। मान्यता है कि अपने माता-पिता के अपमान से क्रोधित परशुराम ने संपूर्ण भूमि को 21 बार क्षत्रियों का संहार कर क्षत्रिय विहीन किया था। लेकिन जब इसके बाद भी उनका क्रोध शांत नहीं हुआ तो भगवान शिव की सलाह पर उत्तरकाशी के वरुणावत पर्वत पर तपस्या की थी, जिसके बाद उनका क्रोध शांत हुआ। यहां भगवान परशुराम का क्रोध शांत होने के चलते ही उत्तरकाशी को सौम्यकाशी नाम से भी जाना जाता है।

सात चिरंजीवियों में से एक भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। अपने तप से उन्होंने भगवान शिव को प्रसंन्न कर उनसे परशु प्राप्त करने के चलते ही उनका नाम परशुराम पड़ा था। ऋषि जमदग्नि व माता रेणुका के पुत्र परशुराम के क्षत्रियों का संहार करने के पीछे भी एक कहानी है।

क्षत्रियों का संहार के पीछे की कहानी

कहा जाता है कि एक बार क्षत्रिय समाज के हैहय वंश के राजा सहस्त्रार्जुन अपनी पूरी सेना के साथ जंगलों से होता हुआ जमदग्नि ऋषि के आश्रम में विश्राम करने पहुंचा। महर्षि जमदग्रि ने सहस्त्रार्जुन को अपने आश्रम का मेहमान समझकर खूब स्वागत सत्कार किया। ऋषि जमदग्रि के पास देवराज इंद्र से प्राप्त दिव्य गुणों वाली कामधेनु नामक चमत्कारी गाय थी। उसी गाय की मदद से जमदग्नि ऋषि ने कुछ ही पलों में सहस्त्रार्जुन की पूरी सेना के लिए भोजन का प्रबंध किया।

कामधेनु गाय की ऐसी अद्भुत शक्तियों को देखकर सहस्त्रार्जुन के मन में उसे पाने की इच्छा हुई, उसने ऋषि जमदग्नि से कामधेनु को मांगा, लेकिन उन्होंने ये कहकर उसे देने से इनकार कर दिया कि यह गाय ही उनके जीवन के भरण-पोषण का एकमात्र जरिया है। लेकिन सहस्त्रार्जुन कहां मानने वाला था।

सहस्त्रार्जुन ने क्रोध में आकर ऋषि जमदग्नि के आश्रम को उजाड़ दिया और कामधेनु गाय को अपने साथ ले जाने लगा, लेकिन तभी कामधेनु सहस्त्रार्जुन के हाथों से छूट कर स्वर्ग की ओर चली गई। इसके बाद जब भगवान परशुराम अपने आश्रम पहुंचे तो अपने आश्रम को तहस-नहस देखकर और अपने माता-पिता के अपमान की बातें सुनकर क्रोध में आ गए और उन्होंने उसी वक्त सहस्त्रार्जुन और उसकी सेना का नाश करने का संकल्प लिया था।

बाड़ाहाट में स्थित है प्राचीन परशुराम मंदिर

जिला मुख्यालय के बाड़ाहाट में परशुराम का प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर के गर्भगृह में कमल रुपी पाषाण खंड के ऊपर पाषाण मूर्ति है, जिसमें भगवान विष्णु के चौबीस अवतार उकेरे गए हैं। परशुराम अवतार की एक झलक भी इन चौबीस अवतारों में से एक है। मंदिर के प्रवेश द्वार के बायीं ओर शिलालेख से पता चलता है कि इस मंदिर का जीर्णोद्धार टिहरी नरेश सुदर्शन शाह के मंत्री धर्मदत्त ने सन 1842 में करवाया था।

आज निकाली जायेगी शोभा यात्रा

परशुराम मंदिर के पुजारी शैलेंद्र नौटियाल ने बताया कि परशुराम जन्मोत्सव पर रविवार दैनिक पूजा, श्रृंगार के बाद सुंदरकांड के बाद 11 बजे दिन में मंदिर से शोभा यात्रा निकाली जायेगी। इसके बाद भी मंदिर में दिनभर भजन-कीर्तन का कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा।

हिमालय की गोद में बसी उत्तरकाशी के वरुणावत पर्वत पर ही भगवान परशुराम ने तपस्या की थी। तपस्या के बाद ही उनका जो रौद्र रुप था, वह सरल व सौम्य हो गया था। इसी कारण उत्तरकाशी को सौम्यकाशी के नाम से भी जाना जाता है। - शैलेंद्र नौटियाल, पुजारी परशुराम मंदिर उत्तरकाशी

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