पारिजात वृक्ष की पौराणिक कथा: समुद्र मंथन से निकलने के बाद स्वर्ग से धरती तक कैसे पहुंचा यह पवित्र पेड़?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, पारिजात वृक्ष समुद्र मंथन से उत्पन्न हुआ और इंद्र इसे स्वर्ग ले गए। भगवान कृष्ण इसे ...और पढ़ें

पारिजात वृक्ष की अद्भुत कहानी समुद्र मंथन से स्वर्ग और धरती तक का सफर (Picture Credit: AI Generated)
HighLights
पारिजात वृक्ष समुद्र मंथन से उत्पन्न 14 रत्नों में से एक।
भगवान कृष्ण इसे स्वर्ग से पृथ्वी पर लाए थे।
इंद्र के श्राप से फूल रात में खिलते, फल नहीं लगते।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में कई ऐसी कथाएं और मान्यताएं हैं जो इसके महत्व को और ज्यादा बढ़ाती हैं। ऐसी ही एक कथा है समुद्र मंथन में निकली हुई कुछ पवित्र चीजों से जुड़ी हुई।
जिस समय देवताओं और असुरों में अमृत की प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन हुआ तब उसमें 14 रत्न निकले और सभी रत्नों से अपना एक अलग स्थान प्राप्त किया। इन्हीं रत्नों में से एक था पवित्र पारिजात वृक्ष, जो इतना सुंदर था कि तुरंत इसे इंद्र देव स्वर्ग ले गए।
हरिवंश पुराण की मानें तो पारिजात वृक्ष को 'कल्पवृक्ष' भी माना जाता है और जो भी व्यक्ति इसके सामने अपनी इच्छाओं को रखता है वो पूर्ण अवश्य होती हैं। समुद्र मंथन के दौरान निकला यह रत्न आरंभ में स्वर्ग में स्थापित हुआ, लेकिन बाद में यह धरती पर आ गया। आइए आपको बताते हैं कैसे यह वृक्ष स्वर्ग से धरती पर पहुंचा और विष्णु जी का प्रिय पौधा बना।
पारिजात वृक्ष कहां से प्रकट हुआ?
पौराणिक कथाओं के अनुसार पारिजात वृक्ष को कल्प या कामना वृक्ष भी कहा जाता है। यह वृक्ष समुद्र मंथन में निकलने वाले 14 प्रमुख रत्नों में से एक था और जैसे ही यह प्रकट हुआ उस समय इसके फूलों की खुशबू इतनी अच्छी थी कि उससे आकर्षित होकर इंद्र तुरंत ही इसे स्वर्ग ले गए।
हमारे देश में कई ऐसे पेड़ पौधे मौजूद हैं जिन्हें बेहद अद्भुत और पवित्र माना जाता है इन पेड़ पौधों के बारे की कई रोचक कथाएं भी हिंदू धार्मिक ग्रंथों में मिलती है। इन्हीं मान्यताओं के अनुसार, पारिजात की पूजा करने से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
पारिजात वृक्ष धरती पर कैसे आया?
शास्त्रों के अनुसार पारिजात के पौधे को सबसे पहले स्वर्ग में स्थापित किया गया, लेकिन कालांतर में भगवान कृष्ण ने देवराज इंद्र से इसका एक बीज लेकर उसको अपनी पत्नी देवी रुक्मिणी को उपहार स्वरूप दिया और यह पौधा पृथ्वी पर भी आ गया। वहीं जैसे-जैसे यह पौधा बड़ा होने लगा और इसके फूल बहुत खुशबूदार होने लगे उस समय नारद मुनि ने श्री कृष्ण की दूसरी पत्नी सत्यभामा से कहा कि कृष्ण ने यह कितना गुणकारी पौधा देवी रुक्मिणी को उपहार में दिया है और उन्हें नहीं दिया।
इस बात पर सत्यभामा ने भी श्री कृष्ण से पारिजात वृक्ष को धरती पर लाने का आग्रह किया। उस समय कृष्ण जी देवराज इंद्र के पास पहुंचे और उनसे इस वृक्ष को धरती पर लाने की प्रार्थना की, लेकिन इंद्र ने उनका विरोध ाकरते हुए कृष्ण पर वज्र से प्रहार किया। उस समय सत्यभामा ने श्री कृष्ण की रक्षा के लिए घोर तपस्या की और यह वृक्ष पृथ्वी पर आ गया।
इंद्र के श्राप की वजह से पारिजात में रात में खिलते हैं फूल
जिस समय श्री कृष्ण पारिजात वृक्ष को धरती पर ला रहे थे तब देवराज इंद्र ने इस पौधे को श्राप दिया कि इस पेड़ के फूल सिर्फ रात में खिलेंगेऔर इस पेड़ पर कभी फल नहीं आएगा।
ज्योतिष शास्त्र के इस पौधे को बेहद ही गुणकारी पौधा माना जाता है, लेकिन इसमें कोई फल नहीं होता है और इसके फूल सिर्फ रात के समय खिलते हैं। हालांकि, इन फूलों को खुशबू दूर-दूर तक फैलती है। यह पौधा विभिन्न औषधीय गुणों से भी भरपूर होता है।
इस वृक्ष की एक पौराणिक कथा यह भी है कि जब यह वृक्ष पृथ्वी पर आ गया तब श्री कृष्ण की पत्नी रुक्मिणी को उसके फूल अत्यंत प्रिय लगे। उस समय श्री कृष्ण ने इस वृक्ष को यह वरदान दिया कि यह पेड़ भले ही सत्यभामा के बगीचे में है, लेकिन इसके फूल रुक्मिणी के बगीचे में गिरेंगे।
पारिजात का वृक्ष आज भी जहां लगा होता है, उसके आस-पास खुशबू फैल जाती है और यह विभिन्न औषधीय गुणों से भरपूर होता है।
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