'पंडा को लग गई चुड़ेलन’… बुंदेलखंड के इस अनोखे भजन के बिना आखिर क्यों अधूरा लगता है नवरात्र का जगराता?
'पंडा को लग गई चुड़ेलन बुंदेलखंड का एक लोकगीत है जो नवरात्र के जगरातों में अपनी खास जगह रखता है। ...और पढ़ें

नवरात्र में जगराते की रौनक बढ़ाता है बुंदेलखंड का अनोखा भजन (Picture Credit: AI Generated)
HighLights
'पंडा को लग गई चुड़ैलन' बुंदेलखंड का प्रसिद्ध नवरात्र लोकगीत है।
यह गीत जगरातों में भक्तों को आकर्षित करता है, कहानी सुनाता है।
गीत मोह-माया से दूर रहने का गहरा आध्यात्मिक संदेश देता है।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। नवरात्र आते ही देश के अलग-अलग हिस्सों में माता रानी के भजनों और लोकगीतों की गूंज सुनाई देने लगती है। कहीं माता दुर्गा के जस गाए जाते हैं, तो कहीं स्थानीय लोकधुनों पर माता की महिमा का गुणगान भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करता है। इन नौ दिनों में माता को खुश करने के लिए जगराते किए जाते हैं और भक्तजन माता की भक्ति में झूमते नजर आते हैं।
मध्य प्रदेश और बुंदेलखंड के इलाकों का ऐसा ही एक लोकगीत है 'पंडा को लग गई चुड़ेलन', जिसके बोल सुनते ही कई लोगों को गांव के जगराते, देवी पंडाल और नवरात्र की रातें याद आ जाती हैं। यही नहीं बुंदेली लोग तो इस भजन को सुनते ही थिरक उठते हैं। यह सिर्फ एक लोकगीत नहीं बल्कि अपनी बोली, कहानी और मतलब के लिए भी दूर-दूर तक प्रचलित है। आइए आपको बताते हैं इस भजन के छिपे हुए मतलब और इससे जुड़ी अन्य बातें।
क्या है 'पंडा को लग गई चुड़ेलन' भजन की कहानी?
इस लोक गीत की शुरुआत 'पंडा को लग गई चुड़ेलन, पंडा उड़तो फिरे...' शब्दों से होती है। लोकभाषा में गाए इस पूरे भजन में एक ऐसे पंडा का जिक्र हो रहा है जिसके ऊपर एक चुड़ैल का प्रभाव पड़ जाता है। गीत में 'बैरन' शब्द का भी इस्तेमाल किया गया है जिसे नकारात्मक शक्ति से जोड़ा जाता है।
इस भजन की सबसे रोचक बात यह है कि पंडा खुद कोई साधारण व्यक्ति नहीं बल्कि 'गूनिया', यानी झाड़-फूंक करने वाला है और वो दूसरों को तंत्र बाधाओं से दूर करता है, लेकिन वही ऐसी स्थिति में फंस जाता है। गीत में इसी विडंबना को लोक अंदाज में काफी रोचक तरीके से दिखाया गया है। जो माता रानी के जगराते में भक्तों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है।
नवरात्र और जगराते से कैसे जुड़ा यह लोकगीत?
बुंदेली लोकभाषा और ग्रामीण जीवन से जुड़े गीतों की लंबे समय से अपनी एक अलग पहचान रही है। 'पंडा को लग गई चुड़ेलन' भी इसी लोक परंपरा का हिस्सा बनकर अलग-अलग गायकों और मंचों तक पहुंचा है।
माता रानी के जगरातों में इस लोकगीत की खास जगह इसलिए बनती है क्योंकि इनमें केवल देवी की स्तुति नहीं की गई है, बल्कि स्थानीय भाषा, ग्रामीण जीवन, लोकविश्वास और कहानी भी शामिल है। इन सभी का मेल होने के कारण यह मध्यप्रदेश और आस-पास के राज्यों में भी भक्तों को आकर्षित करने के लिए गाया जाता है।
नवरात्र में जगराते का महत्व क्या है?
नवरात्र में जागरण या जगराते का मतलब पूरी रात जागते हुए माता दुर्गा के भजन कीर्तन करना। इस दौरान भजन करने से न सिर्फ माता दुर्गा का आशीर्वाद मिलता है बल्कि मां की दिव्य ऊर्जा भी मिलती है।
जब समूह में कोई भी भजन या गीत माता के समर्पित किया जाता है तब ये न सिर्फ माता की भक्ति का प्रतीक होता है, बल्कि एकता को भी दिखाता है। जगराता पूरी रात चलता है और रात अज्ञानता का प्रतीक है। ऐसे में भक्ति के साथ पूरी रात जागना अज्ञानता पर ज्ञान की विजय को दिखाता है।
पंडा को लग गई चुड़ेलन' लोक गीत का आध्यात्मिक महत्व
इस पूरे लोकगीत में चुड़ैल को मोह-माया, लालच और गलत रास्तों का प्रतीक माना जाता है और पंडा यानी कोई भी ऐसा व्यक्ति जो मोह के पाश में पूरी तरह से बंधा हुआ है और उससे निकल पाना उसके लिए मुश्किल है। वास्तव में इस लोक भजन के पीछे छिपा संदेश यही है कि व्यक्ति को मोह रूपी असुर से दूर ही रहना चाहिए, अन्यथा उसके जीवन में कई समस्याएं आ सकती हैं।
'पंडा को लग गई चुड़ेलन' किस भाषा में है?
यह गीत एक ऐसे गुनिया पंडा की लोककथा को बुंदेलखंडी भाषा में प्रस्तुत करता है और पूरे भजन में इसी भाषा का प्रयोग है। इस पूरे लोकगीत में उड़तो फिरे, गुनिया, बनो थो और कहवे जैसे बुंदेली शब्दों का इस्तेमाल हुआ है, जो मध्यप्रदेश के लोगों के लिए खास महत्व रखता है।
बुंदेलखंड का यह मशहूर लोकगीत सालों से नवरात्र के जागरण की शान रहा है, जिस सुनते ही न सिर्फ मध्यप्रदेश बल्कि पूरे देश में भक्त माता की भक्ति में झूम उठते हैं।
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