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सिर्फ कैंची धाम नहीं, वृंदावन में है नीम करोली बाबा की महासमाधि, जानिए उनके जीवन के अंतिम पलों का अनसुना सच

Published: Fri, 25 Sep 2026 10:55 AM (IST)

नीम करोली बाबा का महासमाधि भंडारा उत्सव 25 सितंबर को मनाया जाता है, और हाल ही में रिलीज हुई फिल्म 'हनुमान अंश' ने उनकी महिमा में रुचि बढ़ाई है।

नीम करोली बाबा ने 11 सितंबर 1973 को ली थी अंतिम सांस

नीम करोली बाबा ने 11 सितंबर 1973 को ली थी अंतिम सांस 

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हर साल 25 सितंबर को नीम करोली बाबा के आश्रम में महासमाधि भंडारा उत्सव मनाया जाता है। वहीं, हाल ही में नीम करोली बाबा पर रिलीज हुई फिल्म 'हनुमान अंश' ने दर्शकों के बीच भारी उत्साह पैदा कर दिया है। इस फिल्म को बड़ी संख्या में लोग देख रहे हैं। यही कारण है कि बाबा की महिमा को जानने के लिए भारी संख्या में भक्त वृंदावन स्थित नीम करोली आश्रम पहुंच रहे हैं।

हनुमान जी के परम भक्त थे नीम करोली बाबा

जानकारी के लिए बता दें कि नीम करोली बाबा ने वृंदावन को अपनी साधना का केंद्र बनाया था और परिक्रमा मार्ग पर ही उन्होंने समाधि ली थी। ऐसे में इस आर्टिकल में जानते हैं नीम करोली बाबा के जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें जानते हैं।

नीम करोली बाबा ने वृंदावन में 11 सितंबर 1973 को अंतिम सांस ली थी, जिसके बाद वहीं पर उनकी समाधि बनाई गई। वैसे बाबा ने उत्तराखंड के कैंची धाम में तपस्या की थी और वहां भी उनका प्रसिद्ध आश्रम है। नीम करोली बाबा भगवान हनुमान जी के परम भक्त थे।

बाबा की अंतिम यात्रा भी वृंदावन में पूरी हुई

सितंबर 1973 की शुरुआत में जब बाबा आगरा गए थे, तब अचानक उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। इसके बाद उन्हें ट्रेन के द्वारा आगरा से वृंदावन लाया गया। यहां उन्हें इलाज के लिए रामकृष्ण मिशन अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके। 11 सितंबर 1973 को बाबा ने वृंदावन में अंतिम सांस ली। उस दिन अनंत चतुर्दशी का पर्व था। नीम करोली बाबा के भक्त इसे सामान्य मृत्यु नहीं, बल्कि ‘महासमाधि’ के रूप में याद करते हैं। बाबा की अंतिम यात्रा भी उसी वृंदावन में पूरी हुई, जिससे उनका आध्यात्मिक रिश्ता लंबे समय से जुड़ा था।

11 वर्ष की उम्र में त्याग दिया था घर

समाजसेवी राधाकृष्ण पाठक बताते हैं कि बाबा का जन्म वर्ष 1900 में फिरोजाबाद जिले के टूंडला-आगरा के मध्य स्थित अकबरपुर गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम दुर्गाप्रसाद शर्मा और माता का नाम कौशल्या देवी था। जब बाबा की उम्र मात्र 11 वर्ष थी, तब उन्होंने घर त्याग दिया था और वे नागा साधुओं के साथ भ्रमण किया करते थे। इसी दौरान वे गुजरात में मोरबी के बवानिया गांव पहुंचे। यहां पर उन्होंने एक सरोवर के तट पर हनुमान जी की मूर्ति की स्थापना की और तपस्या करना शुरू किया।

17 वर्ष की उम्र में उनका भगवान हनुमान के साथ सर्वोच्च आध्यात्मिक जुड़ाव स्थापित हो गया था। इसके बाद अपनी लीलाएं कर उन्होंने वह स्थान त्याग दिया और एक संन्यासी का जीवन अपनाकर लोगों के कल्याण के लिए यात्राएं करते रहे।

इसके बाद नीम करोली बाबा ने फर्रुखाबाद में अपना लीला केंद्र बनाया। कहा जाता है कि यहां पर उन्होंने ट्रेन रोककर रेलवे स्टेशन का निर्माण करवाया था। फिर उन्होंने उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में नैनीताल के पास कैंची धाम को अपना लीला केंद्र बनाया। वर्ष 1965 में बाबा ने वृंदावन में डेरा जमाया और अटल्ला चुंगी परिक्रमा मार्ग पर अपना आश्रम बनाने का फैसला किया।

वृंदावन में बाबा ने महासमाधि ली

भक्त बनवारीलाल पाठक ने बताया कि 11 सितंबर 1973, अनंत चतुर्दशी के दिन नीम करोली बाबा ने अंतिम सांस ली थी। अपनी वृंदावन लीला के समय उन्होंने अपने परम भक्त बनवारीलाल पाठक को अपने पास बुलाया था। उनके सामने ही बाबा ने महासमाधि ली और अपनी लीलाओं को पूर्ण किया। बनवारीलाल जी इस महासमाधि के साक्षी थे। इसके बाद उन्हीं के निर्देशन में वृंदावन में नीम करोली बाबा के महासमाधि स्थल का निर्माण कार्य संपन्न हुआ।

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