रामायण के सूत्र: मुश्किल वक्त में याद रखें विभीषण की यह बातें, हर संकट से निकलने का मिलेगा रास्ता
रामायण में विभीषण ने रावण का साथ छोड़कर धर्म का मार्ग चुना और प्रभु श्री राम की शरण ली, उन्होंने कठिन परिस्थितियों से निकलने का रास्ता दिखाया।

विभीषण की ये बातें आपको हर संकट से बाहर निकलने में करेंगी मदद (Picture Credit: AI Generated)
HighLights
कठिन समय में प्रभु श्री राम की शरण लें।
विपत्ति में भी धर्म और सज्जन का साथ न छोड़ें।
धैर्य बनाए रखें और सही व्यक्ति का चुनाव करें।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। रामायण काल के सभी पत्रों में से धर्म का साथ देने वाले विभीषण का नाम भी हमेशा याद किया जाता है। रावण के भाई होने के बाद भी उन्होंने कभी भी धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा और जब उन्हें ऐसा लगा कि लंकापति रावण का अहम बढ़ रहा है और वो अधर्म को अपना रहे हैं, तब उन्होंने रावण को छोड़कर प्रभु श्री राम की शरण ले ली।
यही नहीं रामायण के सुंदरकांड की चौपाइयों में इस बात का प्रसंग विस्तार से मिलता है कि विभीषण ने सदैव रावण को समझाने और राम की शरण में जाने का प्रयास किया, लेकिन उसने जब उनकी बात नहीं मानी तो वो रावण को छोड़कर चले गए। इस पूरे प्रसंग में विभीषण की कुछ ऐसी बातें हैं जो आज भी लोगों मुश्किल समय से बाहर आने और कभी भी धर्म का साथ न छोड़ने की सीख देते हैं। आइए जानें विभीषण की कुछ ऐसी बातों के बारे में जो आपको भी हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए।
कठिन परिस्थिति में प्रभु की शरण लेना
रामायण में जब विभीषण को लगा कि रावण के साथ रहने से वह अधर्म का साथ देंगे, तब उन्होंने श्री राम की शरण ली। उनकी यह सीख आज भी प्रासंगिक है कि जीवन में जब भी कठिन समय आए श्री राम की शरण में जाना चाहिए। श्री राम कहते हैं कि 'अगर कोई सौ पाप करके भी मेरी शरण में आता है, तो मैं उसे आश्रय अवश्य देता हूं। रामायण के सुंदरकांड में एक चौपाई है-
कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
इसका अर्थ यह है कि- जब विभीषण प्रभु श्री राम की शरण में आए तब वो कहते हैं कि अगर यदि किसी पर करोड़ों ब्राह्मणों की हत्या का पाप भी लगा हो, तो भी मेरी शरण में आने पर मैं उसका त्याग नहीं करता हूं। जैसे ही कोई व्यक्ति निष्कपट भाव से मेरी शरण में आता है उसके कई जन्मों के पाप भी क्षण भर में नष्ट हो जाते हैं।
विपात्ति में भी धर्म का साथ देना
रामायण के सुंदरकांड के 42 वीं चौपाई में बताता गया है कि रावण के भाई विभीषण ने कभी भी धर्म का साथ नहीं छोड़ा और हमेशा सज्जन व्यक्तियों का सम्मान किया।
अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयू हीन भए सब तबहीं॥
साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी॥
इस चौपाई का अर्थ -
ऐसा कहकर विभीषण जी ज्यों ही चले, त्यों ही सब राक्षस आयुहीन हो गए और शिव जी माता पार्वती से कहते हैं कि हे भवानी! साधु का अपमान तुरंत ही संपूर्ण कल्याण की हानि कर देता है॥ इस वजह से कठिन समय में धैर्य बनाए रखना और सज्जन का साथ देने में भी व्यक्ति की भलाई है।
विभीषण ने रामायण काल में श्रीराम का साथ चुना और आगे चलकर लंका पर विजय पर भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे यह सीख मिलती है कि मुश्किल समय में हमेशा धैर्य के साथ सज्जन व्यक्ति की शरण लेनी चाहिए।
विभीषण की ये बातें आज के समय में भी प्रासंगिक हैं और जो व्यक्ति इन्हें ध्यान में रखता है उन्हें जल्द ही मुश्किल समय से बाहर निकलने में मदद मिलती है।
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