क्या आप जानते हैं कैसे हुई त्रिदेव की उत्पत्ति? जानिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश के जन्म का सबसे बड़ा रहस्य
हिंदू धर्म में ब्रह्मा, विष्णु और महेश को त्रिदेव कहा जाता है। यह लेख उनकी उत्पत्ति के रहस्य और पूजा ...और पढ़ें

कौन हैं त्रिदेव? (Picture Credits- AI Image)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में ब्रह्मा, विष्णु और महेश को त्रिदेव कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, ब्रह्मा जी को सृष्टि का रचयिता कहा जाता है और भगवान विष्णु सृष्टि का संचलान करते हैं। साथ ही भगवान शिव को नष्ट करने वाला देवता माना गया है।
हिंदू धर्म ग्रंथों और पुराणों में त्रिदेव की उत्पति का वर्णन विस्तार से देखने को मिलता है। क्या आपको पता है कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश की उत्पत्ति कैसे हुई? ऐसे में आइए इस आर्टिकल में आपको विस्तार से बताते हैं कि कैसे हई त्रिदेव की उत्पत्ति।
कैसे हुई त्रिदेवों की उत्पत्ति
ब्रह्मा जी- पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर योगनिद्रा में लीन थे, तो उनकी नाभि में से कमल प्रकट हुआ। उसी कमल से ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई थी। इसलिए ब्रह्मा जी को स्वयंभू भी कहा जाता है। उत्पत्ति के बाद जब ब्रह्मा जी कमल से उठे, तो उन्होंने सभी दिशाओं में देखा। ब्रह्मा जी के चार मुख उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम दिशा को दर्शाते हैं।

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भगवान विष्णु- जब सृष्टि में अंधकार था, तो ब्रह्मजी ने भगवान शिव का रूप धारण किया। सृष्टि के निर्माण के लिए भगवान शिव और माता आदि ने अपने बाएं अंग से भगवान विष्णु को उत्पन्न किया। इसके बाद उन्हें सृष्टि का कार्यभार सौंपा। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भगवान विष्णु की उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग कथाएँ प्रचलित हैं।
भगवान शिव- पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान ब्रह्मा और विष्णु जी के बीच सर्वश्रेठ को लेकर विवाद हुआ था, तो ऐसे में भगवान शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए। अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव को रुद्र रूप को ब्रह्मा जी से उत्पन्न बताया गया है, लेकिन शिव जी का रूप निराकार है।
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त्रिदेव की पूजा का महत्व
धार्मिक मान्यता के अनुसार, रोजाना त्रिदेव की साधना करने से साधक को जीवन में भौतिक सुखों की प्राप्ति होती है। साथ ही जीवन में आने वाले संकट दूर होते हैं। इसके अलावा आध्यात्मिक उन्नति होती है। साथ ही जन्म-मरण के बंधनों से छुटकारा मिलता है। इसलिए कहा जाता है कि त्रिदेव की पूजा-अर्चना जरूर करनी चाहिए।
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