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सौतेली मां ने ठुकराया, तो 5 साल के बच्चे की जिद ने उसे बना दिया आसमान का अटल 'ध्रुव तारा'

Published: Sat, 11 Jul 2026 01:10 PM (GMT+05:30)

ध्रुव तारा की पौराणिक कथा दृढ़ता और अटूट भक्ति का प्रतीक है, जिसमें बालक ध्रुव ने अपनी माता की प्रेरणा से भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की।

ध्रुव तारा बनने की पौराणिक कहानी (Picture Credits- AI Image)

ध्रुव तारा बनने की पौराणिक कहानी (Picture Credits- AI Image)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। रात के समय आकाश में एक तारा बाकी सभी तारों से काफी ज्यादा चमकीला और स्थिर दिखाई देता है, जिसे ध्रुव तारा कहा जाता है, लेकिन क्या आपको पता है कि, इस खगोलीय मार्गदर्शक की जड़े भारतीय पौराणिक कथाओं से जुड़ी है।

ध्रुव तारा की कहानी सिर्फ एक कहानी नहीं है, बल्कि दृढ़ता, संकल्प शक्ति और अटूट भक्ति का प्रतीक है, जो समय से भी परे है।

ध्रुव कौन था?

प्राचीन काल में उत्तानपाद राजा के राज्य में एक ध्रुव नाम के लड़के का जन्म हुआ। राजा की 2 पत्नियां थीं। एक महारानी का नाम सुनीति था, जो स्वभाव से काफी दयालु थीं, तो वहीं दूसरी रानी सुरुचि महत्वाकांक्षी और अभिमानी स्वभाव की थी। ध्रुव सुनीति का बेटा था, लेकिन उसे आए दिन अपने पिता की तरफ से उपेक्षा का सामना करना पड़ा क्योंकि सुरुचि राजपरिवार पर अपना प्रभुत्व रखकी थी और इस बात पर हमेशा ध्यान रखती कि उसका बेटा ही सबसे उत्तम और सर्वोपरि हो।

एक दिन युवा और स्वभाव से काफी भोला-भाला ध्रुव अपने पिता की गोद में बैठने की इच्छा जताई। लेकिन राजकुमारी सुरुचि ने कठोरता से उन्हें रोकते हुए कहा, तुम राजा की गोद में बैठने के काबिल नहीं हो। यदि तुम्हें यह सम्मान चाहिए, तो अगले जन्म में तुम्हें मेरे पुत्र के रूप में जन्म लेना होगा।

भगवान श्रीहरि और ध्रुव की कथा (1)

रानी सुरुचि के कठोर शब्दों से उस नन्हें से बालक को आघात पहुंचा और उसकी आंखों में आंसू आ गए। सांत्वना पाने के लिए ध्रुव फौरन अपनी मां की ओर भागा। सुनिति जो खुद काफी उदास थी, ने प्यार से ध्रुव को समझाया कि, यदि तुम ऐसी जगह चाहते हो, जहां कोई भी तुम्हें अस्वीकार न कर सके, तो भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त करो। इस जगह में सिर्फ वही तुम्हें शाश्वत सम्मान दे सकते हैं।

ध्रुव की अटूट भक्ति

अपनी माता के शब्दों से प्रेरित होकर पांच साल का ध्रुव भगवान विष्णु की तलाश में यात्रा पर निकल गया। यात्रा के दौरान वह एक घने जंगलों के बीच में पहुंचा, जहां उसने तपस्या शुरू की। ध्रुव ने कठोर मौसम, जंगली जानवरों और भूख का सामना करते हुए संपूर्णता के साथ ध्यान किया। ध्रुव ने विष्णु नाम को इतनी तीव्रता से जाप किया कि, उनकी तपस्या से आकाश का संतुलन बिगड़ने लगा।

ध्रुव के निश्चय संकल्प को देखकर महान ऋषि नारद मुनि उनके सामने आए। नारद मुनि ने हतोत्साहित करने के प्रयास से ध्रुव की कठिनाई सहने पर संदेह जताया। लेकिन ध्रुव का संकल्प टस से मस नहीं हुआ। छोटे से बच्चे के तप बल से प्रभावित होकर नारद ने उन्हें विष्णुजी का आह्वान करने के लिए खास मंत्रों का आशीर्वाद दिया और उनकी खोज आगे का रास्ता बताया।

भगवान श्रीहरि और ध्रुव की कथा (2)

भगवान विष्णु का आशीर्वाद

कई महीनों की कठोर तपस्या के बाद भगवान विष्णु तक ध्रुव की भक्ति पहुंच गई। भगवान विष्णु अपने पूर्ण दिव्य रूप के साथ छोटे से बच्चे के सामने आए। भगवान के दर्शन पाकर ध्रुव आनंद से भर उठा। उसने श्रद्धापूर्वक भगवान विष्णु के चरण स्पर्श किए। बच्चे की भक्ति से प्रभावित होकर विष्णु जी ने उसे वर मांगने को कहा।

लेकिन ध्रुव ने अपनी निष्कपटता में न तो बदला लेने की इच्छा रखी और न ही सांसारिक सुख की। इसके बजाय उन्होंने एक ऐसा उच्च पद मांगा जिसे कोई भी हटा न सके। खुश होकर भगवान विष्णु ने ध्रुव को ब्रह्मांड में ध्रुव तारा का स्थान प्रदान किया। एक ऐसा पद जो शाश्वत महिमा और स्थिरता का प्रतीक है।

भगवान विष्णु के आशीर्वाद से ध्रुव आकाश में एक ध्रुव तारा बन गया। आज भी यह तारा उत्तरी आकाश में काफी शांत और मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है।

भगवान श्रीहरि और ध्रुव की कथा

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