जब कलीग हर चीज में कमियां निकाले, तो रिएक्ट नहीं- अर्जुन की तरह ‘सम-बुद्धि’ अपनाइए
भगवद्गीता के 'कर्मण्येवाधिकारस्ते' श्लोक और सम-बुद्धि के सिद्धांत का उपयोग करते हुए बताता है कि कार्यस्थल पर नकारात्मक सहकर्मियों से ...और पढ़ें

भगवद्गीता से जानिए ऑफिस पॉलिटिक्स और निगेटिविटी का हल (Picture Credits- AI Images)
HighLights
नकारात्मक सहकर्मियों से निपटने में गीता का ज्ञान।
सम-बुद्धि से मन को शांत और संतुलित रखें।
बाहरी नकारात्मकता को अपनी शांति भंग न करने दें।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। ऑफिस में मेरे एक कलीग के पास हर चीज के लिए कुछ न कुछ कमेंट जरूर होता है। कंपनी में वर्कलोड काफी हेक्टिक और जिस तरह से काम चल रहा है ऐसा न हो कि अगले साल तक कंपनी बंद हो जाए। उसके साथ लंच के बाद पूरी दोपहर काम से ज्यादा भारी लगने लगती है।
नेगेटिव लोग लगभग हर ऑफिस और आपके आसपास देखने को मिल जाते हैं। जिन्हें हर काम में कुछ न कुछ कमियां नजर ही आती है। भगवद्गीता के चैप्टर 6 का श्लोक-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
अर्थात्- भगवान कृष्ण कहते हैं कि जो इंसान दोस्त और दुश्मनों के प्रति और अच्छे और बुरे लोगों के प्रति एक जैसी भावना और सोच रखता है, जीवन में वे हमेशा आगे रहता है।
जीवन की सुरक्षा इसी की बराबरी में है कि आप हर चीज को एक ही नजर से देखते हैं, तो मन परेशान या उत्सुक नहीं होता है।
नेगेटिव चुपचाप फैलती है
यह बात सुनने में थोड़ी अजीब लग सकती है लेकिन उदास बातें अक्सर अपना असर दिखाती है। बीस मिनट की शिकायतों के बाद एक अच्छा दिन भी नकारात्मक और शक वाला हो सकता है। ऐसे में इस असर को कम करने के लिए ध्यान देना पहला बचाव है। आपका खराब मूड बाहर से आया और आप इसे वहीं छोड़ सकते हैं।
कृष्ण ने यहां सम-बुद्धि शब्द का इस्तेमाल किया है। यह एक ऐसे मन के बारे में है जो लोगों को पसंद या नापसंद करने की तेजी से नहीं झुकाता है।
एक जैसापन दूसरों को इमोशनल टोन सेट करने से रोकता है। एक नेगेटिव कलीग सिर्फ कलीग ही रहता है।
ऐसी स्थिति में आप किसी और के साथ लंच कर सकते हैं। फैमिली फोन कॉल को छोटा रख सकते हैं। किसी संगति करनी है यह पूरी तरह आप पर ही निर्भर करता है।
नेगेटिव लोगों से बातचीत को टालना छोड़े
किसी निराशावादी व्यक्ति की सोच को सही करने की कोशिश करने से आमतौर पर बातचीत लंबी हो जाती है। ऐसे में एक छोटा-सा जवाब बेहतर काम करता है। 'हो सकता है' या 'समय ही बताएगा' नेगेटिव कलीग की नकारात्मक बातों से छुटकारा दिला सकता है।
कौरवों ने अर्जुन के परिवार के साथ सालों तक क्रूरता की थी। यह दुख काफी गहरा था। कृष्ण ने फिर भी उससे संतुलित मन से काम करने को कहा। दूसरों की दुश्मनी से अर्जुन की अंदरूनी हालत तय नहीं होनी चाहिए थी।
भगवद्गीता का यह श्लोक आपकी शांति की रक्षा करता है, इसके चारों ओर दीवार खड़ी नहीं करता है।
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