जब अहंकार में इंद्र ने बरसाया कहर! गोवर्धन पर्वत और 56 भोग की वो कहानी, जिसके बिना अधूरी है गोवर्धन पूजा
गोवर्धन पूजा पर भगवान श्रीकृष्ण को 56 भोग क्यों लगाए जाते हैं, यह लेख इसकी विस्तृत जानकारी देता है। इसमें ...और पढ़ें
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56 भोग का धार्मिक महत्व (Picture Credits- AI Images)
HighLights
गोवर्धन पूजा पर 56 भोग का महत्व बताया गया है।
श्रीकृष्ण ने इंद्र के क्रोध से ब्रजवासियों को बचाया था।
गोवर्धन पर्वत उठाकर 56 भोग की परंपरा शुरू हुई।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हर साल देशभर में गोवर्धन पूजा के पर्व को बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन ब्रज में खास रौनक देखने को मिलती है। यह पर्व प्रकृति और भगवान के अटूट संबंध का प्रतीक है। इस अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण और गोवर्धन पर्वत की विशेष पूजा-अर्चना करने का विधान है। साथ ही उन्हें 56 भोग भी अर्पित किए जाते हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन साधना करने और 56 भोग लगाने से सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है और पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर गोवर्धन पूजा के दिन भगवान श्रीकृष्ण को 56 भोग क्यों लगाए जाते हैं? अगर नहीं, तो आइए इस आर्टिकल में विस्तार से जानते हैं इसके पीछे की वजह।
56 भोग का क्या है रहस्य?
दीपावली के अगले दिन मनाई जाने वाली गोवर्धन पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन पूजा के दौरान भगवान श्रीकृष्ण को 56 भोग लगाने की खास परंपरा है। इससे जुड़ी कथा का वर्णन श्रीमद्भागवत पुराण और विष्णु पुराण में मिलता है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, द्वापर युग में एक समय ऐसा आया जब ब्रजवासियों ने भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर इंद्रदेव की पूजा न करके गोवर्धन पर्वत की पूजा की। इससे इंद्रदेव क्रोधित हो गए और उन्होंने पूरे ब्रज में मूसलाधार बारिश कर दी। इससे ब्रजवासियों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा।
ऐसे में भगवान श्रीकृष्ण ने पूरे ब्रजमंडल और पशु-पक्षियों की रक्षा के लिए अपनी सबसे छोटी उंगली पर विशाल गोवर्धन पर्वत को लगातार सात दिनों तक उठाए रखा। इसके बाद जब बारिश रुक गई, तो सभी ब्रजवासी अपने-अपने घरों से भगवान श्रीकृष्ण को भोग लगाने के लिए विशेष पकवान लाए। तभी से भगवान श्रीकृष्ण को 56 भोग लगाने की परंपरा शुरू हुई।
56 भोग का धार्मिक महत्व
56 भोग भगवान के प्रति भक्त के पूर्ण समर्पण का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि प्रकृति से हमें जो कुछ भी प्राप्त हुआ है, वह ईश्वर का ही है और हम कृतज्ञता के साथ उसे प्रभु को वापस अर्पित कर रहे हैं।
यह परंपरा याद दिलाती है कि देवराज इंद्र जैसे शक्तिशाली देवता का अहंकार भी भगवान के सामने टूट गया था। 56 भोग चढ़ाकर भक्त अपने भीतर के अहंकार को त्यागकर प्रभु की शरण में जाते हैं।
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