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भोजन बनाते और खाते समय कैसी होनी चाहिए मनस्थिति? 'जैसा अन्न, वैसा मन' के पीछे का असली रहस्य समझें

Published: Fri, 18 Sep 2026 12:37 PM (IST)

शुद्ध आहार केवल शारीरिक पोषण ही नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि और मानसिक शांति भी प्रदान करता है। धार्मिक ग्रंथों के ...और पढ़ें

भोजन का आध्यात्मिक महत्व (Picture Credits- AI Images)

भोजन का आध्यात्मिक महत्व (Picture Credits- AI Images)

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समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हम सभी ने कभी न कभी अपने घर में बड़ों से यह जरूर सुना होगा कि, 'जैसा होगा अन्न, वैसा होगा मन', लेकिन क्या आपने कभी इसके पीछे की असल गहराई को समझने की कोशिश की है?

छांदोग्योपनिषद और गरुड़ पुराण जैसे धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि, शुद्ध आहर केवल आपका पेट ही नहीं भरता, बल्कि आपको आंतरिक शुद्धि के साथ बल भी प्रदान करता है।

भोजन मन को प्रभावित करता है

भारतीय परंपरा में भोजन को मन और अंतःकरण को प्रभावित करने वाला माना गया है। जब मन में गुस्सा, चिंता या तनाव हो तो भोजन करने के बिल्कुल भी इच्छा नहीं होती है। वहीं शांत और प्रसन्न मन में साधारण भोजन भी अच्छा लगता है, इसलिए सिर्फ भोजन कैसा है, यह नहीं देखना चाहिए, बल्कि खाना खाते समय मन कैसा है यह भी मायने रखता है।

आपकी थाली में सिर्फ अन्न ही नहीं होता है। एक निवाला हमारी थाली तक पहुंचने में प्रकृति और अनेक लोगों के योगदान से आता है। इसमें पृथ्वी, जल, आकाश, सूर्य और किसान की मेहनत छिपी होती है। इसलिए भोजन को सिर्फ स्वाद की वस्तु न मानकर कृतज्ञता के साथ भी ग्रहण करने की भावना रखनी चाहिए।

food mind connection garuda purana chandogya upanishad rules for eating (1)

शास्त्रों में भोजन को लेकर कहा गया है कि,

'आहार शुद्धौ सत्त्व शुद्धि:'

अर्थात्- जब आहार शुद्ध होता है, तो अंत करण की शुद्धि भी होती है। जब व्यक्ति का अंत करण शुद्ध होता है, तो मन स्थिर होकर ईश्वर के चिंतन में लगने लगता है।

ऐसे में शुद्ध आहार का मतलब सिर्फ भोजन का साफ-सुथरा होना नहीं है, बल्कि भोजन से जुड़ी इन बातों पर भी खास ध्यान देने की जरूरत है।

भोजन बनाने वाले की भावना कैसी है?

  • भोजन बनाने के लिए आसपास का वातावरण
  • भोजन पकाने वाली की मन स्थिति
  • साफ-सफाई

भोजन बनाते समय भावना क्यों जरूरी है?

भोजन सिर्फ सामग्री से नहीं बनता है, भोजन बनाने वाले व्यक्ति का स्वच्छता, संयम, सद्भावना और प्यार भी उतना ही जरूरी है। इसीलिए घर के भोजन में अक्सर अपनापन महसूस होता है।

भोजन को इतना महत्व क्यों दिया गया है?

अन्नं ब्रह्मा रसो विष्णुर्भोक्ता देवो महेश्वरः।

अर्थात्- भोजन ब्रह्म है, उसका सार विष्णु और उसका सेवन करने वाला महेश्वर है। यह जानकर भोजन का सेवन करने वाला व्यक्ति उससे जुड़ी किसी भी तरह की अशुद्धि से अछूता रहता है। आपको अन्न के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की भावना रखनी चाहिए, क्योंकि इसी से हमारे शरीर को ऊर्जा मिलती है।

भोजन करते समय 4 बातों का रखें खास ध्यान

भोजन करते समय हर किसी को कुछ खास बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।

  • सबसे पहले शांत मन से भोजन करना चाहिए।
  • खाना खाते समय भोजन धीरे-धीरे और शांति के साथ करना चाहिए।
  • खाना खाते समय मोबाइल फोन या टीवी देखने से बचना चाहिए। इससे मन भोजन करने पर ध्यान नहीं देता है।
  • खाना खाने से पहले अन्न को ईश्वर की कृपा मानकर ग्रहण करना चाहिए।

आपको सिर्फ थाली को ही नहीं, बल्कि अपने विचारों को भी शुद्ध करने की जरूरत है, क्योंकि जैसा होगा अन्न, वैसा बनेगा मन। अगली बार भोजन आए, तो उसे सिर्फ खाना नहीं, बल्कि ऊपरवाले का आशीर्वाद समझकर प्रेम, शांति और कृतज्ञता से ग्रहण करें।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।