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व्रत में एक ही बार क्यों खाते हैं खाना? जानिए इसके पीछे की गहरी मान्‍यता

Published: Sat, 10 Oct 2026 08:00 PM (GMT+05:30)

हिंदू धर्म में व्रत के दौरान एक बैठक में भोजन करने का विशेष महत्व है। जानिए क्यों व्रत में बार-बार ...और पढ़ें

व्रत में एक बार भोजन करने का महत्‍व। (Picture Credit- AI Generated)

व्रत में एक बार भोजन करने का महत्‍व। (Picture Credit- AI Generated)

HighLights

  1. मन और इंद्रियों पर नियंत्रण का प्रतीक है।

  2. भगवान के प्रति समर्पण का भाव दर्शाता है।

  3. पूजा-पाठ में एकाग्रता बनाए रखने में सहायक।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में व्रत रखने का विशेष महत्व है। लोग भगवान की पूजा, मन की शांति और अपनी मनोकामना पूरी होने की इच्छा से व्रत रखते हैं। व्रत के दौरान खानपान से जुड़े कई नियमों का पालन किया जाता है। इन्हीं में से एक नियम है एक बैठक में भोजन करना। कई घरों में ऐसा माना जाता है कि व्रत के दिन बार-बार खाने के बजाय एक ही बार बैठकर भोजन करना चाहिए। लेकिन इसके पीछे क्या धार्मिक मान्यता है और इसका क्या महत्व है? आइए जानते हैं।

मन और इंद्रियों पर नियंत्रण

व्रत का अर्थ केवल भूखे रहना नहीं है, बल्कि अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखना भी है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, व्रत के दौरान व्यक्ति को अपने विचारों को शुद्ध रखना चाहिए और भगवान की भक्ति में ध्यान लगाना चाहिए। बार-बार खाने से मन भोजन और स्वाद की ओर आकर्षित होता है। इसलिए व्रत में एक बैठक में भोजन करना चाहिए। इसे संयम और आत्मनियंत्रण का प्रतीक माना जाता है।

भगवान के प्रति समर्पण का भाव

हिंदू धर्म में पूजा के बाद भगवान को भोग लगाने की परंपरा है। इसके बाद भोजन को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। मान्यता है कि भोजन को भगवान का आशीर्वाद मानकर श्रद्धा के साथ खाना चाहिए। एक बैठक में भोजन करना इसी भावना को दर्शाता है।

तपस्या और साधना का महत्व

व्रत को धार्मिक साधना का भी एक माध्यम माना जाता है। इसमें व्यक्ति अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखने का प्रयास करता है। एक समय भोजन करने को तप और अनुशासन से जोड़ा जाता है। कुछ व्रतों में एकभुक्त यानी दिन में एक बार भोजन करने का नियम होता है। वहीं, नक्त व्रत में सूर्यास्त के बाद भोजन न करने की परंपरा होती है।

पूजा-पाठ में एकाग्रता बनाए रखना

धार्मिक मान्यता है कि व्रत के दौरान मन को शांत रखकर पूजा-पाठ, मंत्र जाप और ध्यान करना चाहिए। जब व्यक्ति अपने खानपान को लेकर बार-बार सोचता रहे, तो वह एकाग्र नहीं हो सकता है। ऐसे में साधना करना मुश्किल होता है। इसीलिए कुछ लोग व्रत में एक ही बैठक में भोजन करना पसंद करते हैं।

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