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Dussehra 2026: रावण दहन का समय और शस्त्र पूजन का महामुहूर्त, एक क्लिक में पढ़ें पूजा विधि समेत पूर्ण जानकारी

Published: Tue, 20 Oct 2026 06:30 AM (IST)Updated: Tue, 20 Oct 2026 07:02 AM (IST)

दशहरा यानी विजयादशमी का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस दिन रावण दहन के साथ शस्त्र पूजन का भी विशेष महत्व माना जाता है।

दशहरा 2026 रावण दहन शस्त्र पूजा शुभ मुहूर्त और संपूर्ण पूजा विधि

दशहरा 2026 रावण दहन शस्त्र पूजा शुभ मुहूर्त और संपूर्ण पूजा विधि

HighLights

  1. दशहरा 2026, 20 अक्टूबर को मनाया जाएगा।

  2. रावण दहन और शस्त्र पूजा के शुभ मुहूर्त जानें।

  3. विजयदशमी की पूजा विधि, कथा और आरती।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। इस साल दशहरा, जिसे विजयदशमी भी कहा जाता है, मंगलवार, 20 अक्टूबर को मनाया जाएगा। इस दिन बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव पूरे देश में मनाया जाता है। लोग सुबह घर में पूजा करते हैं और मुख्य रूप से शास्त्रों, अपराजिता और शमी के पौधे की पूजा की जाती है।

शाम के समय रावण के पुतले का दहन किया जाता है और लोग एक-दूसरे से गले मिलकर इस त्योहार का पूरा आनंद उठाते हैं। विजयदशमी, आश्विन महीने के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाई जाती है। हिंदू त्योहार हमेशा चंद्र कैलेंडर के अनुसार मनाए जाते हैं और सभी की परंपराएं अलग-अलग होती हैं।

अगर आप भी इस साल दशहरा पर्व की पूजा के शुभ मुहूर्त के साथ शस्त्रों और अपराजिता पूजन की जानकारी लेना चाहते हैं, तो हम आपको पूजा विधि, आरती और व्रत कथा के साथ अन्य बातें यहां विस्तार से बता रहे हैं।

दशहरा 2026 तिथि और शुभ मुहूर्त (Dussehra Festival 2026)

इस साल दशहरा 20 अक्टूबर को मनाया जाएगा। वैसे हिंदू पंचांग में सभी त्योहार उदया तिथि में मनाए जाते हैं, लेकिन रावण का दहन हमेशा प्रदोष काल में होता है, इसलिए यह पर 20 अक्टूबर को है।

  • दशमी तिथि आरंभ: 20 अक्टूबर, दोपहर 12:50 बजे
  • दशमी तिथि समापन: 21 अक्टूबर, दोपहर 2:11 बजे
  • विजय मुहूर्त: 20 अक्टूबर, दोपहर 1:59 बजे से दोपहर 2:45 बजे तक
  • अपराह्न पूजा का समय: 20 अक्टूबर, दोपहर 1:14 बजे से दोपहर 3:30 बजे तक
  • श्रवण नक्षत्र शुरू: 19 अक्टूबर, दोपहर 3:38 बजे
  • श्रवण नक्षत्र समाप्त: 20 अक्टूबर, शाम 6:02 बजे

परंपरागत रूप से, 'विजय मुहूर्त' को किसी भी महत्वपूर्ण काम को शुरू करने के लिए बहुत शुभ माना जाता है, चाहे वह नई नौकरी हो, कोई खरीदारी हो या कोई अन्य काम शुरू करना हो। 'अपराह्न' पूजा वह समय होता है जब शमी पूजा और अपराजिता पूजा की जाती है। आप यहां बताए मुहूर्त के अनुसार ही पूजा कर सकते हैं।

दशहरा 2026 रावण दहन का शुभ मुहूर्त (Ravan Dahan 2026)

  • रावण दहन मुख्य रूप से सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल और सिंह लग्न में किया जाता है।
  • प्रदोष काल- 20 अक्टूबर 2026, सायं 5:47 बजे के बाद रावण दहन किया जा सकता है।
  • गोधूलि मुहूर्त- शाम 6:41 बजे से शाम 7:07 बजे तक।
  • यदि आप इसी शुभ मुहूर्त में रावण दहन करेंगे तो शुभ होगा।

दशहरा शस्त्र पूजा का शुभ मुहूर्त

दशहरा के दिन शस्त्र पूजा विजय मुहूर्त में की जाती है। यहां जानें सबसे शुभ मुहूर्त के बारे में-

  • विजय मुहूर्त-दोपहर 1 बजकर 59 मिनट से 2 बजकर 45 मिनट तक।
  • अपराह्न पूजा मुहूर्त- दोपहर 1 बजकर 14 मिनट से शाम 3 बजकर 30 मिनट तक।

दशहरा पूजा विधि (Dussehra Puja Vidhi)

दशहरा के दिन पूजा करने के लिए आप एक आसान विधि का पालन कर सकते हैं।

  • इस दिन प्रातः जल्दी उठकर स्नान आदि से मुक्त होकर पूजन शुरू करें।
  • पूजा स्थान को अच्छी तरह से साफ करने के बाद चौकी पर राम दरवार स्थपित करें और सभी तस्वीरों और मूर्तियों को तिलक लगाएं।
  • इस दिन माता दुर्गा का पूजन भी करें और माता को लाल चुनरी ओढ़ाएं।
  • समस्त देवी-देवताओं को रोली, चंदन, अक्षत, पुष्प और नैवेद्य चढ़ाएं और पूजन करें।
  • इस दिन आप घर में शास्त्रों को पूजा भी करें और सभी औजारों में रोली का तिलक लगाएं।
  • कुछ क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार, इस दिन गोबर के 10 उपले बनाकर सभी में पीले फूल चढ़ाएं जाते हैं और पूजा की जाती है।
  • पूजा के बाद विजयदशमी की कथा पढ़ें और श्री राम जी के साथ माता दुर्गा की आरती भी करें।
  • पूजन समाप्त होने के बाद आप सभी भक्तों में प्रसाद वितरित करें और घर की समृद्धि की कामना करें।

दशहरा और विजयदशमी की कथा

दशहरा की कुछ प्रसिद्द कथाओं में से एक श्री राम और रावण के युद्ध की है और दूसरी माता दुर्गा के महिषासुर का वध करने की है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार अयोध्या के राजकुमार श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास हुआ। वन में एक दिन माता सीता का अपहरण करके रावण अपने देश लंका ले गया था।

प्रभु श्री ऋष्यमूक पर्वत पर आश्‍विन प्रतिपदा से नवमी तक आदिशक्ति की उपासना की थी। इसके बाद भगवान श्रीराम इसी दिन किष्किंधा से लंका के लिए गए। प्रभु श्रीराम ने हनुमान और अन्य वानर सेना की मदद से लंका पर हमला किया और दशमी तिथि के दिन ही रावण पर विजय प्राप्त की। तभी से हर साल आश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी को दशहरा के रूप में मनाया जाता है।

विजयदशमी की कथा के अनुसार रम्भासुर का पुत्र महिषासुर, अत्यंत शक्तिशाली था। उसने कठिन तप किया था और ब्रह्माजी से यह वरदान मांगा कि देवता, असुर और मानव किसी से मेरी मृत्यु न हो।

यह भी कहा कि किसी स्त्री के हाथ से मेरी मृत्यु हो। वरदान पाने के बाद उसने तीनों लोकों पर अपना अधिकार जमा कर त्रिलोकाधिपति बन गया। उसके बाद माता दुर्गा ने महिषासुर मर्दिनी रूप में उस असुर का वध किया और उस दिन भी अश्विन माह की दशमी तिथि थी, जिसे विजयदशमी का नबाम दिया गया।

दशहरा के दिन पढ़ें यह आरती

।। भगवान श्री रामचंद्रजी की आरती।।

श्री राम चंद्र कृपालु भजमन हरण भव भय दारुणम्।

नवकंज लोचन कंज मुखकर, कंज पद कन्जारुणम्।।

कंदर्प अगणित अमित छवी नव नील नीरज सुन्दरम्।

पट्पीत मानहु तडित रूचि शुचि नौमी जनक सुतावरम्।।

भजु दीन बंधु दिनेश दानव दैत्य वंश निकंदनम्।

रघुनंद आनंद कंद कौशल चंद दशरथ नन्दनम्।।

सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदारू अंग विभूषणं।

आजानु भुज शर चाप धर संग्राम जित खर-धूषणं।।

इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनम्।

मम ह्रदय कुंज निवास कुरु कामादी खल दल गंजनम्।।

मनु जाहिं राचेऊ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर सावरों।

करुना निधान सुजान सिलू सनेहू जानत रावरो।।

एही भांती गौरी असीस सुनी सिय सहित हिय हरषी अली।

तुलसी भवानी पूजि पूनी पूनी मुदित मन मंदिर चली।।

दोहा- जानि गौरी अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।

मंजुल मंगल मूल वाम अंग फरकन लगे।।

अगर आप यहां बताए तरीके से दशहरा की पूजा करेंगे, तो माता दुर्गा के आशीर्वाद और प्रभु श्री राम की कृपा से जीवन में सदैव खुशहाली बनी रहेगी।

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