विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

दुर्गा पूजा 2026: केले के पेड़ को दुल्हन की तरह सजाया जाता है, क्या है 'कोलाबौ' की अनोखी परंपरा का रहस्य?

Published: Sun, 18 Oct 2026 11:59 AM (IST)

पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान 'कोलाबौ' की अनोखी रस्म निभाई जाती है, जिसमें केले के पेड़ को दुल्हन ...और पढ़ें

दुर्गा पूजा में केले के पेड़ को क्यों बनाते हैं दुल्हन? जानें कोलाबौ रस्म का रहस्य (Picture Credit: AI Generated)

दुर्गा पूजा में केले के पेड़ को क्यों बनाते हैं दुल्हन? जानें कोलाबौ रस्म का रहस्य (Picture Credit: AI Generated)

HighLights

  1. कोलाबौ रस्म में केले के पेड़ को दुल्हन बनाते हैं।

  2. इसे नवपत्रिका भी कहते हैं, नौ पौधों की पूजा।

  3. यह दुर्गा पूजा की अनोखी परंपरा और शक्ति का प्रतीक।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा की धूम है और पूरा शहर माता दुर्गा की भक्ति में डूबा हुआ है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं होता है बल्कि कई परंपराओं का एक अनोखा संगम भी होता है। ऐसे ही दुर्गा पूजा में एक रस्म होती है कोलाबौ की।

यह रस्म इसलिए खास मानी जाती है क्योंकि इसमें केले के पेड़ को दुल्हन की तरह सजाया जाता है और इसकी पूजा विधि-विधान से की जाती है। ये रस्म वास्तव में दुर्गा पंडाल की एक अनोखी परंपरा है जो न सिर्फ कोलकाता बल्कि पूरे देश को अपनी ओर खींचती है। वैसे तो मुख्य रूप से यह रस्म दुर्गा सप्तमी की सुबह निभाई जाती है, लेकिन किसी भी दुर्गा पंडाल में लोगों को इसका कई दिनों से इंतजार रहता है।

इस रस्म को नवपत्रिका नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इसमें नौ तरह के पत्तों से विधि-विधान के साथ पूजन किया जाता है। इस रस्म को कोलाबौ कहने के भी कई कारण हैं। आइए आपको बताते हैं इस परंपरा के अनोखे रहस्य।

क्या है कोलाबौ की रस्म

चूंकि दुर्गा पूजा मुख्य रूप से बंगाल का पर्व है, इसलिए इस रस्म का संबंध भी बंगाल से है। बंगाली भाषा में ‘कोला’ का अर्थ होता है केला और ‘बौ’ का मतलब है दुल्हन या पत्नी।

इसका मतलब यह हुआ कि केले के पौधे को दुल्हन की तरह से सजाना। इसमें न सिर्फ केले के पौधे को दुल्हन बनाया जाता है बल्कि अन्य नौ पत्तों के साथ इसकी पूजा भी होती है।

इस पूरी रस्म को नवपत्रिका कहा जाता है जो माता दुर्गा की शक्ति का प्रतीक है। नवपत्रिका का अर्थ नौ पौधों के एक समूह से होता है जिसमें केला के साथ कचू, हल्दी, जयंती, बेल, अनार, अशोक, मानकचू और धान के पौधे भी शामिल होते हैं।

कैसे होती है कोलाबौ की रस्म

सभी नौ पत्तों को एक साथ बांधकर पूजा की जाती है और परंपरागत मान्यताओं के अनुसार हर पौधे को माता दुर्गा के अलग रूप में देखा जाता है। इस प्रकार हर एक पत्ती को माता दुर्गा के शक्ति रूप में पूजा जाता है और समृद्धि की कामना की जाती है।

कोलाबौ परंपरा का महत्व 

कोलाबौ की परंपरा में केले के पेड़ के बगल में गणपति की मूर्ति रखकर पूजा की जाती है। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि केले का पेड़ गणपति की पत्नी के रूप में पूजा जाता है बल्कि यह शुभता का प्रतीक है। केले के पौधे को क्रीम या सफ़ेद रंग की बंगाली साड़ी पहनाई होती है। सभी पौधों को एक साथ बांधा जाता है और एक साथ पूजन शुरू होता है। मान्यता है कि नवविवाहित महिला शुभता और समृद्धि का प्रतीक है, इसलिए साड़ी पहनाकर केले के पेड़ को नवविवाहिता का रूप दिया जाता है।

कोलाबौ की रस्म को पूजा का एक तरीका तो माना ही जाता है और ये एक साथ इकठ्ठा होकर पूजन करने का प्रतीक भी है, जो सदियों से दुर्गा पूजा की अनूठी परंपरा को दिखाता आ रहा है।

यह भी पढ़ें- दुर्गा पूजा की मूर्ति में मां की आंखें क्यों होती हैं खास? ‘चक्षुदान’ की इस परंपरा का रहस्य कर देगा हैरान

यह भी पढ़ें- वेश्यालय की मिट्टी के बिना क्यों नहीं बनती मां दुर्गा की प्रतिमा? सोच बदल देगा 'पुण्य माटी' की रस्म का यह सच

अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।