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श्रीकृष्ण ने बताया कैसे पाया जा सकता है मोक्ष, इन 2 श्लोकों में छिपा है सृष्टि और जीवन का असली ज्ञान

Published: Mon, 02 Nov 2026 07:00 AM (IST)

भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता के 14वें अध्याय में जीवन और मोक्ष के गहरे रहस्य बताए हैं। इन दो श्लोकों के ...और पढ़ें

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताए जीवन और चेतना के गूढ़ रहस्य (Picture Credits- AI Images)

श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताए जीवन और चेतना के गूढ़ रहस्य (Picture Credits- AI Images)

HighLights

  1. श्रीमद्भगवद्गीता के 14वें अध्याय में मोक्ष का रहस्य।

  2. सही ज्ञान से जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति।

  3. प्रकृति शरीर देती, ईश्वर आत्मा का संचार करते।

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में श्रीमद्भगवद्गीता को महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता के 14वें अध्याय में जीवन और संसार का बहुत सरल रहस्य समझाया है। एक श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति सही ज्ञान को समझ लेता है, वह परमात्मा से जुड़ जाता है।

वहीं, दूसरे श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण समझाते हैं कि प्रकृति से शरीर मिलता है और ईश्वर से उसमें चेतना या आत्मा आती है। इस बात को जानकर आपके मन में यह सवाल आ रहा होगा कि आखिर वे कौन-से श्लोक हैं, जिनमें जन्म-मरण से मुक्ति का सबसे बड़ा रहस्य छिपा है। ऐसे में आइए इस लेख में विस्तार से जानते हैं इन 2 श्लोकों और उनके हिंदी अर्थ के बारे में।

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥

अर्थ: इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि परम ज्ञान का आश्रय लेकर जो साधक मेरे स्वरूप को प्राप्त कर लेते हैं, वे सृष्टि की रचना के समय भी दोबारा जन्म नहीं लेते और न ही महाप्रलय के समय किसी भी प्रकार से दुखी या विचलित होते हैं। सरल शब्दों में कहें तो, वे जन्म और मरण के सांसारिक चक्र से सदैव के लिए मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं।

जीवन की सीख
इस श्लोक से यह सीख मिलती है कि व्यक्ति को जीवन में आत्मज्ञान प्राप्त कर सुख-दुख, लाभ-हानि और हर उतार-चढ़ाव में शांत रहना चाहिए। जब व्यक्ति ईश्वर की शरण में चला जाता है, तब उसे संकट या मृत्यु का कोई भय नहीं सताता।

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥

अर्थ हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! विभिन्न योनियों में जितने भी प्रकार के जीव उत्पन्न होते हैं, उन सबकी माता मूल प्रकृति है, जो उन्हें स्थूल शरीर प्रदान करती है; और मैं (परमेश्वर) उनमें जीवात्मा रूपी चेतना स्थापित करने वाला बीजप्रद पिता हूँ।

जीवन की सीख
यह श्लोक सिखाता है कि संसार के हर जीव के असली पिता परमात्मा हैं और प्रकृति सबकी माता है। इसलिए हर प्राणी में ईश्वर का अंश देखकर भेदभाव, घमंड और नफरत का त्याग करना चाहिए तथा सभी के प्रति दया, समानता और प्रेम का भाव रखना चाहिए।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।

 

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