आज का पंचांग 17 अक्टूबर: नवरात्र के 7वें दिन माता कालरात्रि की पूजा, जानिए शुभ मुहूर्त और राहुकाल का समय
आज 17 अक्टूबर को शारदीय नवरात्र का सातवां दिन है, जब मां कालरात्रि की पूजा होगी। जानिए आज के पंचांग ...और पढ़ें

शारदीय नवरात्र के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा का विधान है। (Picture Credit- AI Generated)
आनंद सागर पाठक, एस्ट्रोपत्री। शारदीय नवरात्र का सातवां दिन मां कालरात्रि को समर्पित होता है। इस दिन भक्त मां के उग्र स्वरूप की पूजा करके अपने जीवन से भय और नकारात्मकता को दूर करने की प्रार्थना करते हैं।हिंदू पंचांग के अनुसार इस दिन शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि है। इस तिथि को शक्ति की उपासना के लिए बहुत शुभ माना जाता है। नवरात्र के इन पवित्र दिनों में मां सरस्वती की प्रधान पूजा का भी विशेष महत्व होता है, जिसमें विद्या और बुद्धि के लिए प्रार्थना की जाती है।आज चंद्रदेव मूल नक्षत्र में विराजमान हैं, जिसके बाद पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र का आरंभ होगा। मूल नक्षत्र को स्वभाव में गंभीरता और आध्यात्मिकता से जोड़ा जाता है।साथ ही आज तुला संक्रांति का भी संयोग बन रहा है, जब सूर्य देव कन्या राशि से तुला राशि में प्रवेश करेंगे। नवरात्र के इस शुभ दिन पर मां की आराधना करने से सभी बाधाएं दूर होती हैं।
तिथि: शुक्ल पक्ष सप्तमी
मास: आश्विन
दिन: शनिवार
संवत्: 2083
महत्वपूर्ण विवरण
तिथि: शुक्ल पक्ष की सप्तमी – संपूर्ण रात्रि तक
योग: अतिगण्ड – रात्रि 11 बजकर 3 मिनट तक, फिर सुकर्म
करण: गरज – सायं 7 बजकर 11 मिनट तक
करण: वणिज – संपूर्ण रात्रि तक
सूर्य और चंद्रमा की स्थिति
सूर्योदय का समय: प्रातः 6 बजकर 23 मिनट
सूर्यास्त का समय: सायं 5 बजकर 50 मिनट
चंद्रोदय का समय: दोपहर 12 बजकर 27 मिनट
चंद्रास्त का समय: रात्रि 10 बजकर 31 मिनट
सूर्य और चंद्रमा की राशियां
सूर्य देव: कन्या राशि में रात्रि 7 बजकर 57 मिनट तक, फिर तुला राशि में प्रवेश (तुला संक्रांति)
चंद्र देव: धनु राशि में स्थित हैं।
आज के शुभ मुहूर्त
अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11 बजकर 43 मिनट से दोपहर 12 बजकर 29 मिनट तक
अमृत काल: कोई नहीं (आज वर्ज्य काल उपस्थित है)
आज के अशुभ समय
राहुकाल: प्रातः 9 बजकर 15 मिनट से प्रातः 10 बजकर 40 मिनट तक
गुलिकाल: प्रातः 6 बजकर 23 मिनट से प्रातः 7 बजकर 49 मिनट तक
यमगण्ड: दोपहर 1 बजकर 32 मिनट से दोपहर 2 बजकर 58 मिनट तक
आज का नक्षत्र
आज चंद्रदेव मूल नक्षत्र में विराजमान रहेंगे।
मूल नक्षत्र: प्रातः 9 बजकर 47 मिनट तक, फिर पूर्वाषाढ़ा
नक्षत्र स्वामी: केतु
राशि स्वामी: बृहस्पतिदेव
देवता: निर्ऋति (विनाश और परिवर्तन की देवी)
प्रतीक: पेड़ की जड़ें
सामान्य विशेषताएं: मूल नक्षत्र में जन्मे लोग स्वाभिमानी, अनुशासित, गंभीर, उदार, दानी, ईमानदार, कानूनप्रिय, आध्यात्मिक, ज्ञानी और आत्म-चिंतन करने वाले माने जाते हैं। हालांकि, इनमें कभी-कभी क्रोध, अहंकार और एकांतप्रियता जैसे गुण भी देखने को मिल सकते हैं।
सरस्वती पूजा 2026
पूर्वाषाढ़ा पूजा मुहूर्त: दोपहर 3 बजकर 32 मिनट से शाम 5 बजकर 50 मिनट तक
अवधि: 2 घंटे 17 मिनट
पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र प्रारंभ: 17 अक्टूबर, सुबह 9 बजकर 47 मिनट
पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र समाप्त: 18 अक्टूबर, दोपहर 12 बजकर 48 मिनट
शारदीय नवरात्र के पावन पर्व के दौरान मां सरस्वती की पूजा के दूसरे दिन को प्रधान पूजा के रूप में मनाया जाता है। यह दिन मुख्य सरस्वती पूजा का विशेष अवसर होता है। इस पावन अवसर पर विद्यार्थी और साधक विद्या, बुद्धि और कला की प्राप्ति के लिए मां सरस्वती की आराधना करते हैं।
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