राधा अष्टमी पर तुलसी पूजा क्यों मानी जाती है जरूरी? सही पूजन विधि से खुल सकती है किस्मत
राधा अष्टमी पर तुलसी पूजा का विशेष महत्व है, क्योंकि तुलसी को राधा रानी और श्रीकृष्ण दोनों से गहरा संबंध ...और पढ़ें

राधा अष्टमी पर करें तुलसी पूजा: जानें महत्व और सही विधि (Picture Credit: AI Generated)
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राधा अष्टमी पर तुलसी पूजा का विशेष महत्व।
तुलसी को राधा रानी और कृष्ण का प्रिय माना जाता है।
सही विधि से पूजा करने पर मिलती है समृद्धि।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। जिस प्रकार जन्माष्टमी के दिन को श्री कृष्ण के जन्मोत्सव की तरह पूरे देश में धूम-धाम से मनाया जाता है, उसी तरह से राधा रानी के जन्म दिवस को राधा अष्टमी के रूप में मनाया जाता है। इसे राधारानी के दिव्य प्राकट्य का दिन भी कहा जाता है। यह हिंदू धर्म के सबसे पवित्र और आनंदमय त्योहारों में से एक है।
भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि राधा रानी के जन्म के रूप में मनाया जाता है, जो श्री कृष्ण जन्माष्टमी से ठीक 15 दिन के बाद आता है। भक्तों के लिए, यह दिन केवल एक त्योहार नहीं होता है, बल्कि यह श्री राधा जी के प्रति प्रेम को और गहरा करने का अवसर है।
राधा रानी श्री कृष्ण की परम भक्त के रूप में पूजी जाती हैं और उनका प्रेम भक्तों के लिए एक आदर्श रूप में देखा जाता है। राधाष्टमी के दिन श्री जी का पूजन तो विधि पूर्वक किया ही जाता है और इस दिन तुलसी की पूजा करना भी जरूरी होता है। आइए आपको बताते हैं राधाष्टमी के दिन तुलसी की पूजा का महत्व और सही पूजा विधि के बारे में।
राधा अष्टमी पर तुलसी की पूजा क्यों है जरूरी?
वैष्णव परंपरा में, तुलसी का राधा रानी और श्री कृष्ण दोनों के साथ बहुत गहरा और आत्मीय संबंध है। उन्हें कृष्ण जी का सबसे श्रेष्ठ भक्त माना जाता है। तुलसी माता भगवान विष्णु को इतनी प्रिय हैं कि उनकी उपस्थिति के बिना कोई भी पूजा अधूरी मानी जाती है।
यही नहीं पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि तुलसी जिनका नाम वृंदा भी था वो राधा रानी की सबसे प्रिय सखी थीं। वहीं विष्णु प्रिया होने के कारण राधा अष्टमी के दिन भी इनका पूजन अनिवार्य माना जाने लगा। यही नहीं कान्हा जी के साथ राधा रानी को भी तुलसी अर्पित करना सबसे शुभ कार्यों में से एक है।
राधा अष्टमी के दिन तुलसी पूजा की कथा क्या है?
तुलसी पूजा के लिए गर्ग संहिता में एक कथा का वर्णन मिलता है जिसके अनुसार एक बार राधा रानी की समस्त सखियों में श्रेष्ठ चन्द्रनना से राधा रानी ने पूछा कि कृष्ण की प्राप्ति के लिए सबसे बड़ा व्रत और पूजा क्या है? उस समय चंद्रनना ने कहा, तुलसी की सेवा ही श्री कृष्ण को प्रसन्न करने का माध्यम है। हे राधे जो प्रतिदिन तुलसी की भक्ति करते है। वे कोटि सहस्त्र युगों तक अपने उस सुकृत्य का उत्तम फल भोगते है।
उसी समय से कृष्ण जी को पाने के लिए श्री राधा रानी ने आश्र्विन शुक्ल पूर्णिमा से लेकर चैत्र पूर्णिमा तक तुलसी सेवन व्रत का अनुष्ठान किया। व्रत आरंभ करके उन्होंने प्रतिमास पृथक-पृथक रस से तुलसी को सींचा।
राधा अष्टमी पर तुलसी पूजन की विधि
ऐसा कहा जाता है कि जो भी राधाष्टमी का व्रत करता है और श्री जी की पूजा के साथ तुलसी के पौधे की पूजा भी करता है उसके सभी पाप नष्ट होते हैं और उसे समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। आइए जानें तुलसी पूजन की विधि के बारे में-
- राधाष्टमी के दिन आप सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से मुक्त होने के बाद राधारानी का पूजन करें। पूजन के साथ तुसली की पूजा भी करें।
- तुलसी के गमले को नाच्ची तरह से सजाएं और इसमें लाल चुनरी ओढ़ाएं।
- तुलसी के पौधे की जड़ में जल अर्पित कराएं और हाथ जोड़कर तुलसी के मंत्रों का जाप करें।
- राधा रानी को 16 श्रृंगार चढ़ाएं और साथ में तुलसी को भी सुहाग की चीजें चढ़ाएं।
- राधाष्टमी के दिन आप राधा रानी और कान्हा को जो भी भोग चढ़ाएं उसमें तुलसी की पत्तियां चढ़ाएं।
- रात के समय तुलसी के सामने घी का दीपक जलाएं और तुलसी जी की आरती करें।
मनुष्य जिस तुलसी को घर में लगाते हैं उसके सभी हिस्सों के बढ़ने पर उनके कुल को भी बढ़ने का आशीर्वाद मिलता है। इसलिए जो भक्त श्री कृष्ण के साथ तुसली की भी पूजा करता है उसे समस्त पापों से मुक्ति मिलती है। यही नहीं राधा अष्टमी के दिन राधा रानी को भी तुसली पूजन करके प्रसन्न किया जा सकता है।
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