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Kumbh Sankranti 2026: कुंभ संक्रांति पर करें इन सिद्ध मंत्रों का जप, सूर्य देव हर लेंगे आपकी सारी बाधाएं

Published: Sun, 08 Feb 2026 11:00 PM (GMT+05:30)

सूर्य देव के राशि परिवर्तन करने की तिथि पर संक्रांति (Kumbh Sankranti 2026 Date) मनाई जाती है। सूर्य देव 13 ...और पढ़ें

Kumbh Sankranti 2026: कुंभ संक्रांति का धार्मिक महत्व

Kumbh Sankranti 2026: कुंभ संक्रांति का धार्मिक महत्व

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। वैदिक पंचांग के अनुसार, शुक्रवार 13 फरवरी को कुंभ संक्रांति और विजया एकादशी है। इस शुभ अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु गंगा समेत पवित्र नदियों में आस्था की डुबकी लगाते हैं। इसके बाद विधिवत सूर्य देव की पूजा करते हैं। सूर्य साधना करने से साधक को आरोग्य जीवन का वरदान मिलता है। साथ ही करियर को नया आयाम मिलता है। वहीं, पूजा के बाद आर्थिक स्थिति के अनुसार दान-पुण्य करते हैं।

surya dev

ज्योतिषियों की मानें तो कुंभ संक्रांति पर कई मंगलकारी शुभ योग बन रहे हैं। इन योग में सूर्य देव की पूजा करने से साधक को अमोघ फल प्राप्त होगा। अगर आप भी सूर्य देव की कृपा के भागी बनना चाहते हैं, तो कुंभ संक्रांति के दिन पूजा के समय सूर्य मंत्र का जप अवश्य करें। पूजा का समापन सूर्य आरती से करें।

सूर्य मंत्र

1. ॐ ऐहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजो राशे जगत्पते, अनुकंपयेमां भक्त्या, गृहाणार्घय दिवाकर:।

2. जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महाद्युतिम ।
तमोsरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोsस्मि दिवाकरम ।।

3. ऊँ आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यण्च ।
हिरण्य़येन सविता रथेन देवो याति भुवनानि पश्यन ।।

4. ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्रकिरणराय मनोवांछित फलम् देहि देहि स्वाहा।।

5. ऊँ आदित्याय विदमहे दिवाकराय धीमहि तन्न: सूर्य: प्रचोदयात ।।

सूर्याष्टकम

आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर।
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते
सप्ताश्वरथमारूढं प्रचण्डं कश्यपात्मजम् ।
श्वेतपद्मधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्
लोहितं रथमारूढं सर्वलोकपितामहम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्
त्रैगुण्यं च महाशूरं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्
बृंहितं तेजःपुञ्जं च वायुमाकाशमेव च ।
प्रभुं च सर्वलोकानां तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्
बन्धुकपुष्पसङ्काशं हारकुण्डलभूषितम् ।
एकचक्रधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्
तं सूर्यं जगत्कर्तारं महातेजः प्रदीपनम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्
तं सूर्यं जगतां नाथं ज्ञानविज्ञानमोक्षदम् ।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्

सूर्य कवच

श्रणुष्व मुनिशार्दूल सूर्यस्य कवचं शुभम्।
शरीरारोग्दं दिव्यं सव सौभाग्य दायकम्।।
देदीप्यमान मुकुटं स्फुरन्मकर कुण्डलम।
ध्यात्वा सहस्त्रं किरणं स्तोत्र मेततु दीरयेत्।।
शिरों में भास्कर: पातु ललाट मेडमित दुति:।
नेत्रे दिनमणि: पातु श्रवणे वासरेश्वर:।।
ध्राणं धर्मं धृणि: पातु वदनं वेद वाहन:।
जिव्हां में मानद: पातु कण्ठं में सुर वन्दित:।।
सूर्य रक्षात्मकं स्तोत्रं लिखित्वा भूर्ज पत्रके।
दधाति य: करे तस्य वशगा: सर्व सिद्धय:।।
सुस्नातो यो जपेत् सम्यग्योधिते स्वस्थ: मानस:।
सरोग मुक्तो दीर्घायु सुखं पुष्टिं च विदंति।।

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