क्यों लिया था मां दुर्गा ने हिरण का रूप? निशुम्भ के वध से जुड़ी है इस शक्तिपीठ की अद्भुत कहानी
शारदीय नवरात्र के दौरान उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में स्थित मां आदि बद्री भगवती मंदिर में भक्तों की भीड़ उमड़ती ...और पढ़ें

मां आदि बद्री भगवती मंदिर का रहस्य
HighLights
मां आदि बद्री भगवती मंदिर उत्तराखंड के बागेश्वर में।
मां भगवती ने यहीं निशुम्भ दैत्य का वध किया।
शारदीय नवरात्र में मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना।
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। शारदीय नवरात्र का पावन पर्व चल रहा है। यह उत्सव मां दुर्गा के 9 स्वरूपों की पूजा-अर्चना करने के लिए बहुत खास माना जाता है। इस दौरान देशभर में माता रानी के मंदिरों में दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं।
शारदीय नवरात्र में मां दुर्गा के शक्तिपीठ मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है और हर तरफ जय माता दी का जयघोष सुनने को मिलता है। उत्तराखंड में एक ऐसा शक्तिपीठ स्थित है, जहां पर मां भगवती ने निशुम्भ दैत्य का वध किया था। इसका नाम मां आदि बद्री भगवती मंदिर (Maa Adi Badri Bhagwati Temple) है।
यह मंदिर आस्था का केंद्र है। यह मंदिर पारंपरिक हिमालयी वास्तुकला के लिए जाना जाता है। ऐसे में आइए इस आर्टिकल में आपको इस मंदिर से जुड़ी अधिक जानकारी के बारे में विस्तार से बताते हैं।
कहां है मंदिर?
उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के बदियाकोट में प्रसिद्ध मां आदि बद्री भगवती मंदिर स्थित है। इस मंदिर में शारदीय नवरात्र के समय श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिलती है। मंदिर में हर साल शारदीय नवरात्र में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यह शक्तिपीठ बेहद प्रसिद्ध है। इस पवित्र जगह पर मां भगवती ने दैत्य निशुम्भ का वध किया था। इसी वजह से इसका नाम वधकोट पड़ा, लेकिन बाद में इस नाम में बदलाव कर इसे बदियाकोट कर दिया गया।
मंदिर से जुड़ी कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, देवताओं को निशुम्भ दैत्य के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए मां भगवती ने इसी जगह पर उसका वध किया था। मां भगवती के द्वारा निशुम्भ दैत्य का वध करने का वर्णन मार्कण्डेय पुराण में देखने को मिलता है। वहीं, शुम्भ दैत्य का वध मां भगवती ने सुमगढ़ में किया था। इसी वजह से बाद में इसे सुमगढ़ कहा जाने लगा।
पौराणिक कथा के अनुसार, गढ़वाल में एक बार मां भगवती ने मृग का रूप धारण किया। इस मृग का शिकार करने के लिए छलि और बलि ने उसका पीछा किया। इस दौरान वे मृग का पीछा करते हुए बदियाकोट पहुंच गए। जब वे एक छोटी सी पहाड़ी पर पहुंचे, तो माता ने उन्हें कन्या के रूप में दर्शन दिए। देवी ने उन दोनों को पुरानी कथा के बारे में बताया।
इसके बाद उन्होंने वहां एक पवित्र मंदिर बनवाया। उन दोनों को वहां का पुजारी बनाया और खुद अंतर्ध्यान हो गईं। छलि और बलि के छह-छह पुत्र हुए। ये 12 भाई बहुत मशहूर हुए। लोग इन्हें 'बार बदकोटी' के नाम से पूजने लगे।
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