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महाभारत के बाद गांधारी ने कहां बिताया समय जानिए मेरठ के 'गांधारी तालाब' की कहानी

Published: Thu, 25 Jun 2026 06:51 PM (IST)

महाभारत युद्ध में 100 पुत्रों के अंत के बाद महारानी गांधारी हस्तिनापुर छोड़ मेरठ के पास 'गांधारी का तालाब' पर ...और पढ़ें

महाभारत के बाद गांधारी ने कहां बिताया समय जानिए मेरठ के 'गांधारी तालाब' की कहानी (Picture Credit- AI Generated)

महाभारत के बाद गांधारी ने कहां बिताया समय जानिए मेरठ के 'गांधारी तालाब' की कहानी (Picture Credit- AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली।18 दिनों तक चलने वाले महाभारत के युद्ध में कौरवों की हार और पांडवों की जीत के बारे में तो सभी ने सुन रखा है, मगर क्या किसी को यह पता है कि युद्ध के बाद अपने 100 पुत्रों की मृत्यु का शोक मनाने के लिए उनकी मां गांधारी कहां गई थीं। इसकी भी एक कथा है, जो आप महाकाव्य के शल्य पर्व, अध्याय 31 में पढ़ सकते हैं। कथा में स्पष्ट बताया गया है कि गांधारी इस युद्ध के बाद हस्तिनापुर के राजमहल को छोड़कर, वनवास के लिए चली गई थीं। कुछ दिन उन्होंने मेरठ में भी बिताए, जिसके प्रमाण आज तक मौजूद हैं।

'गांधारी का तालाब' की कथा

वर्तमान समय में हस्तिनापुर, मेरठ जिले में है। कथा के अनुसार गांधारी अपने 100 पुत्रों की मृत्‍यु के गम में यहां से 40 किलोमीटर दूर घने जंगल में अपना आगे का जीवन बिताने के लिए आ गई थीं। यहां वह एक कुटिया में रहती थीं। इस स्‍थान पर एक सरोवर भी है, जो उसी काल से मौजूद है। महाकाव्‍य में इस बात को वर्णित किया गया है कि यह सरोवर गांधारी के आंसुओं से बना है। बताया जाता है कि देवी गांधारी अपने पुत्रों के वियोग में इतना रोती थीं कि उनके आंसुओं से पूरा सरोवर ही बन गया।

कुछ मान्यताएं यह भी कहती हैं कि महारानी गांधारी महाभारत युद्ध के बाद जब वन में रहने लगीं, तो इसी तालाब में स्नान करने के बाद वह भगवान शिव की पूजा करती थीं। आज के समय में लोग इस स्थान को परीक्षितगढ़ किले के नाम से जानते हैं।

maharani gandhari

कैसा दिखता है 'गांधारी तालाब'?

इस तालाब के पास देवी गांधारी की बड़ी सी प्रतिमा लगी हुई है। इस तालाब के चारों तरफ पौराणिक मंदिर हैं, जिन्‍हें महाभारत काल के समय का ही बताया जाता है। इन मंदिरों और तालाब की देखरेख नेत्रहीन लोग ही करते हैं। वर्तमान में यह एक पर्यटक स्थल है और बहुत से लोग यहां घूमने और इतिहास जानने के लिए आते हैं। महाभारत के आश्रमवासिका पर्व खंड में गांधारी की मृत्‍यु के बारे में भी विस्‍तार से बताया गया है। मेरठ के वन में कुछ वर्ष बिताने के बाद वह कठोर तपस्‍या करने के लिए हिमालय के वनों में चली गई थीं। वन में आग लगने के कारण उनकी मृत्‍यु हो गई थी।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण अंधविश्वास के खिलाफ है।

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