अहोई अष्टमी पर राधाकुंड में आधी रात को क्यों लगाते हैं आस्था की डुबकी, क्या सच में मिलता है संतान सुख का वरदान?
अहोई अष्टमी पर मथुरा के राधा कुंड में मध्यरात्रि स्नान का चमत्कारी महत्व क्या है? जानिए क्यों निःसंतान दंपति संतान ...और पढ़ें

अहोई अष्टमी पर राधाकुंड में आधी रात स्नान की परंपरा। (Picture Credit- AI Generated)

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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। 1 नवंबर, रविवार को अहोई अष्टमी पर मथुरा के राधाकुंड में भक्तों को भारी भीड़ होगी। क्योंकि इस पर्व पर आधी रात को स्नान करने की परंपरा सदियों पुरानी है। मान्यता है कि इस दिन पति-पत्नी एक साथ पवित्र कुंड में डुबकी लगाते हैं, तो राधारानी उनकी सूनी गोद भरने का आशीर्वाद देती हैं।
यही वजह है कि देशभर से निःसंतान दंपति इस खास दिन राधाकुंड पहुंचते हैं। इस विषय पर हमने वृंदावन के बांकेबिहारी लाल मंदिर के गोसाईं सेवक एंव पंडित श्रीनाथ गोस्वामी जी से बात की।
वह कहते हैं, "इससे जुड़ी श्रीराधा-कृष्ण की एक पौराणिक कथा है। इसी कथा से लोगों की आस्था जुड़ी हुई है। " तो चलिए जानते हैं इस परंपरा का धार्मिक महत्व, पौराणिक कथा और राधारानी के वरदान से जुड़ी मान्यता।
अहोई अष्टमी पर आधी रात को स्नान का क्या है महत्व?
अहोई अष्टमी का व्रत मुख्य रूप से संतान की लंबी आयु, सुख और खुशहाली के लिए रखा जाता है। इस दिन माताएं अहोई माता की पूजा करती हैं। वहीं, मथुरा के राधाकुंड में इस दिन मध्यरात्रि स्नान की विशेष परंपरा है। मान्यता है कि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी की आधी रात को पति-पत्नी एक साथ राधाकुंड में स्नान करते हैं तो उन्हें संतान सुख का आशीर्वाद मिलता है। इसी विश्वास के साथ निःसंतान दंपति यहां पहुंचते हैं और राधारानी के सामने अपनी मनोकामना रखते हैं।
राधाकुंड और श्यामकुंड की उत्पत्ति से जुड़ी कथा
राधाकुंड के पीछे भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी से जुड़ी एक बेहद रोचक पौराणिक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने अरिष्टासुर नाम के राक्षस का वध किया था। इस राक्षस ने बछड़े का रूप धारण कर रखा था। मान्यता के अनुसार, अरिष्टासुर के वध के बाद श्रीकृष्ण ने राधारानी से कहा कि उन्होंने गौवंश से जुड़े जीव का वध किया है, इसलिए उन्हें पाप से मुक्ति के लिए तीर्थ स्नान करना चाहिए।
इसके बाद श्रीकृष्ण ने अपनी बांसुरी से जमीन पर एक कुंड बनाया। इसमें सभी पवित्र तीर्थों का जल आकर मिला। इस कुंड को श्यामकुंड कहा गया। इसके बाद राधारानी और उनकी सखियों ने अपने कंगनों से पास में ही एक दूसरा कुंड खोदा। इसमें भी पवित्र जल भरा गया। इस तरह इस कुंड का नाम राधाकुंड पड़ा।
श्रीकृष्ण और राधारानी ने दिया था संतान सुख का वरदान?
श्रीनाथ जी बातते हैं , श्रीकृष्ण और राधारानी ने राधाकुंड की महिमा स्थापित की और यहां स्नान करने वाले भक्तों को मनोकामना पूर्ण होने का आशीर्वाद दिया। मान्यता है कि अहोई अष्टमी की मध्यरात्रि को इस कुंड में स्नान करने वाले निःसंतान दंपतियों को संतान सुख की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि इस रात पति-पत्नी एक साथ कुंड में डुबकी लगाते हैं और राधारानी से अपनी झोली भरने की प्रार्थना करते हैं।
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