विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 20, 2019 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

मानव जाति में भील सबसे पुरानी जाति है जिनकी लोक परंपरा है गवरी

By Preeti jhaEdited By:
Published: Tue, 20 Aug 2019 12:00 PM (IST)Updated: Tue, 20 Aug 2019 12:04 PM (IST)

भादौ (भाद्रपद) की शुरूआत के साथ गवरी शुरू होती है जो चालीस दिन तक चलती है। गवरी करने वाले कलाकारों के लिए यह दिन किसी तपस्या से कम नहीं।

मानव जाति में भील सबसे पुरानी जाति है जिनकी लोक परंपरा है गवरी
मानव जाति में भील सबसे पुरानी जाति है जिनकी लोक परंपरा है गवरी

उदयपुर, सुभाष शर्मा। मेवाड़ का भील समुदाय में आदिमकाल से चली आ रही एक लोक परंपरा गवरी (लोक नृत्य नाटिका)है। जो समूचे विश्व में उदयपुर संभाग के बांसवाड़ा, डूंगरपुर, राजसमंद और उदयपुर के कुछ गांवों में चली आ रही है।  

भादौ (भाद्रपद) की शुरूआत के साथ गवरी शुरू होती है जो चालीस दिन तक चलती है। गवरी करने वाले कलाकारों के लिए यह दिन किसी तपस्या से कम नहीं। इस दौरान मांस-मदिरा त्याग दिया जाता है। इन दिनों वह जूते-चप्पल तक नहीं पहनते। बिना बिस्तर के ही सोते हैं और दिन में एक ही समय खाना खाते हैं। मेवाड़ में ठंडी राखी पर्व से चालीस दिवसीय गवरी नृत्य की परंपरा शुरू होती है।

इतिहासकार डॉ. महेन्द्र भाणावत ने बताया कि गवरी एक लोक नृत्य है जो गांव में खुशहाली लाने के लिए किया जाता है। विश्व में एक मात्र मेवाड़ ही है, जहां ये लोक परंपरा है। मानव जाति में भील सबसे पुरानी जाति है और गवरी इनकी आदिमकाल से चली आ रही लोक परंपरा है। यह नृत्य शिव-पार्वती को केन्द्र में रखकर किया जाता है। जिस गांव में यह व्रत लिया जाता है, उस गांव के हर आदिवासी घर से एक व्यक्ति यह व्रत करता है।

इससे पूरा गांव इससे जुड़ जाता है। व्रतधारी सवा महीने तक तपस्वी की तरह जीवन जीते हैं। गवरी नृत्य करने वाले हर उस गांव में जाते हैं, जहां गांव की बहन-बेटियों की शादी हुई होती है और वहां गवरी नृत्य करते हैं। इसमें

मांदल और थाली के प्रयोग के कारण इसे राई नृत्य के नाम से जाना जाता है। गवरी केवल केवल पुरुषों के द्वारा ही किया जाता है। गवरी का उद्भव शिव-भस्मासुर की कथा से माना जाता है। इसके खेलों में गणपति काना-गुजरी, जोगी, लाखा बणजारा इत्यादि के खेल होते है।

माता गौरी से निकला गवरी शब्द

गवरी शब्द माता गौरी से निकला है। गौरी मां यानी पार्वती जिसे भील जनजाति गौरजा नाम से पुकारते हैं। उसके अनुसार श्रावण मास की पूर्णिमा के एक दिन बाद देवी गौरजा धरती पर आती हैं और धरती पुत्रों को आशीर्वाद देकर जाती हैं। इसी खुशी में ये लोग गवरी खेलते हैं। भीलों में गवरी को लेकर एक कहानी चर्चित है। कहानी के अनुसार भगवान शिव से सृष्टि का निर्माण हुआ। 

पृथ्वी पर पहला पेड़ बरगद का था जो पाताल से लाया गया था। इस बरगद पेड़ को देवी अम्बाव और उसकी सहेलियां लेकर आई थी। जो उदयपुर के निकट हल्दीघाटी के पास ऊनवास गांव में स्थापित किया गया जो आज भी मौजूद है।  

इस तरह खेलते हैं गवरी

भील लोग गौरजा माता के देवरे (मंदिर)जाकर पाती(पत्ते) मंगाते है। ‘पाती मांगना’ मतलब गवरी खेलने की इजाज़त मांगना होता है। पाती मांगना एक परंपरा है जिसमे देवी की पूजा की जाती है उसके बाद उनसे गवरी खेलने के लिए पूछा जाता है। देवरे में मौजूद भोपा (पंडित) में जब माताजी प्रकट होती है तो उनसे गवरी खेलने की इजाज़त मांगी जाती है। अनुमति मिलने के बाद ही गवरी खेलना शुरू होता है। 

राजस्‍थान की अन्य खबरें पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

राजस्थान मेंं जयपुर के दस थाना क्षेत्र में 21 अगस्त तक धारा 144 लागू