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रेपो रेट बढ़ते ही MSME पर बढ़ेगा ब्याज का बोझ, 1 करोड़ के कर्ज पर 25 हजार रुपये सालाना पड़ेगा अतिरिक्त भार

Published: Thu, 08 Oct 2026 12:56 PM (IST)

रेपो रेट बढ़ोतरी से एमएसएमई की कर्ज लागत बढ़ने की आशंका है। फोरम ने वित्त मंत्री से ब्याज राहत, रियायती ऋण और विशेष त्योहारी पैकेज की मांग की है।

ये AI जनरेटेड प्रतीकात्म्क तस्वीर है।

ये AI जनरेटेड प्रतीकात्म्क तस्वीर है।

HighLights

  1. आरबीआई की रेपो रेट वृद्धि पर वर्ल्ड एमएसएमई फोरम चिंतित।

  2. एमएसएमई पर ब्याज का बोझ बढ़ेगा, त्योहारी मांग प्रभावित होगी।

  3. वित्त मंत्री से ब्याज सबवेंशन, रियायती ऋण की मांग।

मुनीश शर्मा, लुधियाना। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की ओर से रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी कर इसे 5.25 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.50 प्रतिशत किए जाने पर वर्ल्ड एमएसएमई फोरम ने चिंता जताई है। फोरम ने केंद्रीय वित्त मंत्री से हस्तक्षेप कर इस फैसले के एमएसएमई, मध्यम वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों पर पड़ने वाले प्रभाव की समीक्षा करने की मांग की है।

वर्ल्ड एमएसएमई फोरम के अध्यक्ष बादिश जिंदल ने कहा कि महंगाई पर नियंत्रण जरूरी है, लेकिन मौजूदा महंगाई मुख्य रूप से कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, ऊर्जा लागत, भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक सप्लाई चेन में व्यवधान जैसे आपूर्ति पक्ष के कारणों से प्रभावित है। ऐसे में ब्याज दर बढ़ाने से आयातित महंगाई पर प्रभाव सीमित रहेगा, जबकि उद्योगों, कारोबारियों और उपभोक्ताओं की कर्ज लागत बढ़ जाएगी।

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त्योहारी सीजन और रोजगार पर असर

फोरम के अनुसार रेपो रेट बढ़ोतरी ऐसे समय हुई है जब देश त्योहारी सीजन में प्रवेश कर रहा है। दीपावली से पहले उपभोक्ता वस्तुओं, ऑटोमोबाइल, आवास, इलेक्ट्रॉनिक्स, टेक्सटाइल और औद्योगिक उत्पादों की मांग बढ़ती है। ब्याज दर बढ़ने से होम लोन, वाहन लोन, एमएसएमई ऋण और वर्किंग कैपिटल की ईएमआई बढ़ सकती है, जिससे लोगों की क्रय शक्ति और नए निवेश पर असर पड़ने की आशंका है।

फोरम ने कहा कि एमएसएमई क्षेत्र देश की जीडीपी में करीब 30 प्रतिशत और निर्यात में लगभग 45 प्रतिशत योगदान देता है तथा 11 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करता है। ऐसे में सस्ती वित्तीय सुविधा इस क्षेत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। ब्याज दर बढ़ने से उत्पादन लागत बढ़ने, प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता घटने और रोजगार व विस्तार की संभावनाओं पर असर पड़ सकता है।

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राहत की उम्मीद और अतिरिक्त बोझ

फोरम ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि बैंक पूरी 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी कर्जदारों तक पहुंचाते हैं तो एक करोड़ रुपये की वर्किंग कैपिटल सुविधा वाले मैन्युफैक्चरिंग एमएसएमई पर सालाना करीब 25 हजार रुपये का अतिरिक्त ब्याज भार पड़ेगा। वहीं पांच करोड़ रुपये की वर्किंग कैपिटल लिमिट वाली मध्यम आकार की इकाई पर यह अतिरिक्त बोझ करीब 12.5 लाख रुपये सालाना हो सकता है।

फोरम के मुताबिक बढ़ी हुई ब्याज लागत का असर केवल ऋण तक सीमित नहीं रहेगा। कच्चे माल, परिवहन, वेयरहाउसिंग और इन्वेंट्री फाइनेंसिंग की लागत बढ़ने से उद्योगों को उत्पादों के दाम बढ़ाने पड़ सकते हैं, जिसका अंतिम बोझ उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।

वर्ल्ड एमएसएमई फोरम ने वित्त मंत्री से आरबीआई के साथ तत्काल विचार-विमर्श कर एमएसएमई के लिए ब्याज सबवेंशन, रियायती वर्किंग कैपिटल लोन, क्रेडिट गारंटी बढ़ाने, विशेष त्योहारी सीजन क्रेडिट पैकेज और छोटे कर्जदारों पर रेपो रेट बढ़ोतरी का पूरा बोझ न डालने जैसे उपाय करने की मांग की है।

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