जागरण संवाददाता, पटियाला। बहस के समय सभी सदस्यों को मर्यादा में रहते हुए एक स्वस्थ वातावरण में अपनी-अपनी बात कहने का अधिकार है, परंतु जब भाषा अमर्यादित हो जाए तो यह धर्म, समाज व देश और विशेषकर युवाओं के लिए नुकसान का कारण बन जाता है। इससे न केवल उस एक व्यक्ति को ठेस पहुंचाती है, बल्कि समाज का एक बड़ा हिस्सा आहत हो जाता है। अपनी असहमति दर्ज करवाने का दूसरा तरीका तर्क व तथ्य भी हैं। हमें सबसे पहले यह समझना होगा कि इंटरनेट मीडिया पर बहस के दौरान अन्य लोगों का दृष्टिकोण हमसे भिन्न हो सकता है। इसलिए असहमति या वैचारिक फर्क स्वाभाविक है।

बहस में भी अलग विचारों को भी सहजता से सुनकर उसे समझकर जवाब देना चाहिए। सुनने समझने का यह मतलब कभी भी नहीं है कि हम सामने वाले की बात को स्वीकार ही कर रहे हैं। इसका मतलब है कि हम संबंधित व्यक्ति की बात सुनकर अपनी असहमति तर्क व तथ्यात्मक तरीके से दर्ज करवाई जाए। बहस के समय सभी को मर्यादा में रहते हुए स्वस्थ वातावरण में बात कहने का अधिकार है, परंतु जब भाषा अमर्यादित हो जाए तो यह धर्म, समाज व देश और विशेषकर युवाओं के लिए नुकसान का कारण बन जाती हैं।

अगर आपका तर्क तथ्यात्मक होगा तो दूसरे व्यक्ति इसका जवाब नहीं दे पाएंगे और इंटरनेट मीडिया पर मौजूद एक बड़ा ग्रुप बहस को समाप्त करते हुए आपकी बात पर सहमति जताएगा। सरकार ने इंटरनेट मीडिया को लेकर नई हिदायतें जारी कर दी हैं। इसके तहत इंटरनेट मीडिया पर होने वाली बहस में प्रवक्ताओं की जिम्मेदारी भी सुनिश्चित की गई है। इन हिदायतों के बारे में लोगों को जागरूक करना होगा। -बलबीर सिंह जौड़ा, प्रिंसिपल सरकारी सीसे स्कूल, माडल टाउन।

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Edited By: Deepika